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भजन और गायन के द्वारा भगवान को क्यों प्रसन्न किया जाता है?
अध्यात्मिक गुरु/ओशो
Updated Thu, 10 Jul 2014 08:55 AM IST
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धर्म को भिन्न तरह की भाषा का चुनाव करना होता है। धर्म को नीति कथाओं में, काव्य में, अलंकारों में और काल्पनिक कथाओं के द्वारा अपनी बात कहनी होती है। सत्य की ओर संकेत करने के ये सभी अप्रत्यक्ष तरीके हैं- केवल सत्य की ओर संकेत करना, प्रत्यक्ष रूप से चिल्ला कर सूचित न करके केवल कान में फुसफुसाना है। वह तुम तक एक गहन संवाद स्थापित होने के बाद आता है।
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झेन सद्गुरु इक्यू की यह छोटी-छोटी कविताएं अत्यधिक महत्त्व की हैं। स्मरण रहे, ये महान कलात्मक काव्य नहीं है, क्योंकि इससे उसका कोई सरोकार ही नहीं है। काव्य को एक पद्धति की भांति प्रयुक्त किया गया है, जिससे वह तुम्हारे हृदय में हलचल कर सके। कविता करना उसका लक्ष्य नहीं है।
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इक्यू की अभिरुचि महान काव्य का सृजन करने में नहीं है, वह वास्तव में एक कवि न होकर एक रहस्यदर्शी है। लेकिन वस्तुतः गद्य में कहने की अपेक्षा, एक विषिष्ट कारण से वह अपनी बात कविता के द्वारा कह रहा है। वह कारण है- कविता के पास चीजों की ओर संकेत करने का एक प्रत्यक्ष तरीका।
कविता में स्त्रीत्व है। गद्य में पौरुष है। गद्य का पूरा ढांचा ही तर्कयुक्त होता है, और काव्य मौलिक रूप से अतर्कपूर्ण होता है। गद्य को बिल्कुल स्पष्ट, प्रतिरोध रहित और परदर्शी होना होता है, जब कि काव्य को धुला और अस्पष्ट सा होना होता है- और यही उसका गुण और सौंदर्य होता है।
गद्य को जो अभिव्यक्त करना है, वह पूरी तरह से वही बात कहता है, जबकि कविता बहुत सी बातें कहती है। दिन-प्रतिदिन के संसार में और बाजार के बीच गद्य की ही आवश्यकता होती है। लेकिन जब भी हृदय की किसी चीज को व्यक्त करना होता है, तो गद्य हमेषा अपर्याप्त लगता है और किसी को कविता की ही शरण में जाना होता है।
साभार
ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली