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धार्मिक व्यक्ति होने का यह फायदा नहीं जानते होंगे
श्रीराम शर्मा आचार्य/अध्यात्मिक गुरू
Updated Thu, 27 Nov 2014 03:19 PM IST
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संसार में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म-सम्प्रदायों को देखने पर यह पता चलता है कि उनके बाह्यस्वरूप एवं क्रिया-कलापों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। यह अंतर होना उचित भी है, क्योंकि जिस वातावरण, जिन परिस्थितियों में वे पनपे और फैले हैं, उनकी छाप उन पर पड़ना स्वाभाविक है।
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मनीषी, अवतारी, महामानवों ने देश काल, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठता-संवर्द्धन एवं निकृष्टता-निवारण के लिए जो सिद्धान्त एवं आचार शास्त्र निर्मित किए हैं कालान्तर में वे ही धर्म-संप्रदायों के नाम से पुकारे जाने लगे। इस कारण उनके बाह्य रूप में विविधता होना स्वाभाविक है। फिर भी, जहां तक मौलिक सिद्धान्तों की बात है, वह सभी तथाकथित धर्मों में एक ही है।
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सभी ने एक सार्वभौम सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, मानव का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया है। सभी प्रचलित धर्मों में ‘प्रार्थना’ को किसी न किसी रूप में स्वीकार किया एवं अपने दैनिक क्रिया-कृत्यों में सम्मिलित किया गया है। अमेरिका के विख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ. ब्रिल ने कहा है- ‘कोई भी व्यक्ति, जो वास्तव में धार्मिक है, मनोरोगों का शिकार नहीं हो सकता।’
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धार्मिक कर्मकाण्डों में जो प्रार्थना की जाती है एवं किसी न किसी प्रकार श्रेष्ठ विचारों के स्वाध्याय का क्रम चलता है, वह अशुभ एवं निकृष्ट चिंतन से उत्पन्न मनोरोगों और मनःशारीरिक रोगों के उपचार के लिए रामबाण औषधि की तरह काम करता है।
प्रसिद्ध विचारक डेल कारनेगी ने लिखा है- ‘जीवन की जटिलताओं और विषमताओं से संघर्ष करके सफलता पाने में कोई भी व्यक्ति अकेले समर्थ नहीं है, आस्था और विश्वास के साथ इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाए।’ मौलाना रूम ने कहा है- ‘रूह की दोस्ती इल्म और ईमान से है, उसके लिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि में कोई फर्क नहीं है।’
प्रसिद्ध ईसाई धर्मोपदेशक जस्टिन ने ईसाइयों को उपदेश देते हुए कहा- ‘जितनी भी श्रेष्ठ विचार हैं, वे चाहे किसी भी देश या धर्म की हों, सब मनुष्यों के लिए ईश्वरीय निर्देश की तरह हैं।’
उपरोक्त विवेचनों से यही निष्कर्ष निकलता है कि विविध धर्मों के बाह्य कलेवर एवं क्रिया-कृत्यों में न्यूनाधिक भिन्नता भले ही हो, परन्तु सबका प्राण तत्त्व एक ही है। धर्म का सच्चा स्वरूप वस्तुतः वही है, जो शाश्वत सिद्धान्तों के रूप में सभी धर्मों में विद्यमान है। धर्म के उस प्राण तत्त्व को हृदयंगम कर व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट किए जाने से ही सबका कल्याण संभव हो सकेगा और मानवीय समाज सुख-शांति का जीवन जी सकेगा।
'गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार'