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जानिए, वेदांत के अनुसार व्यक्ति कब शैतान के कब्जे में होता है
प. श्रीराम शर्मा आचार्य/ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार
Updated Thu, 29 Jan 2015 08:51 AM IST
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वेदान्त के सर्वश्रेष्ठ भाग को राजयोग कहा गया है, जो सिखाता है कि शरीर के मस्तिष्क तथा देह पर कैसे नियंत्रण रखा जाय। इसमें अष्टाङ्ग योग, प्राणायाम आदि सिखाए गए हैं। मूल तो दर्शन है, शेष क्रिया योग सामान्य सा खेल है।
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नीतिशास्त्र का सर्वप्रथम नियम यह है कि अपने पड़ोसी को अपनी तरह प्यार करें। प्यार क्यों करें? इसका उत्तर वेदान्त में मिलेगा, नीतिशास्त्र में नहीं। वेदान्त का ‘तत्त्वमसि’ पड़ोसी को इसलिए नहीं चाहेगा कि वह हमारी भलाई करेगा, अपितु तत्त्वमसि तो स्प्रिचुअल बनने, एक परम पिता की संतान होने की बात सिखाता है।
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यही नीतिशास्त्र का मूलभूत सिद्धान्त है ‘आध्यात्मिक एकता’। इस सृष्टि में किसी व्यक्ति को दुःख पहुँचाने का कोई कार्य हम नहीं करेंगे। इतना ही नहीं, किसी अन्य को नुकसान पहुंचाकर अपना लाभ नहीं उठाएंगे।
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वेदान्त का सत्य निरूपण विभिन्न मत-मतान्तरों के बीच ही नहीं, अपितु वास्तविक धर्म तथा वास्तविक विज्ञान के बीच इस समस्वरता का संस्थापन करता है, जो आज की अतीव आवश्यकता है।
मैक्समूलर ने कहा था-‘सभी तत्त्वज्ञान की विचार-धाराओं में वेदान्त सर्वोत्तम है, क्योंकि वह हर प्रकार के तत्त्वज्ञानों और सभी धर्मों का समन्वय करता है।’ सनातन धर्म के अनुसार परम शक्ति एक ही हो सकती है, चाहे आप किसी सम्प्रदाय के क्यों न हों।
यह दिव्य शक्ति न केवल मनुष्यों को ही जीवन प्रदान करती है, अपितु पशु तथा वनस्पति सृष्टि एवं जड़ सृष्टि को भी जीवन प्रदान करती है, क्योंकि जड़ से भी मालीक्युलर ऐक्टिविटी जैसे कि इलेक्ट्रॉन आयन, स्टेम्प या मालीक्युल की चित्र-विचित्र संरचना-हलचल हरदम होती रहती है।
इसे आप चाहे लाइफ फोर्स या प्राण नाम दे सकते हैं, पर वेदान्त के अनुसार सारी सृष्टि प्राण तत्त्व से भरी हुई है। वेदान्त कहता है कि वास्तव में मानवता ही ईश्वरत्व है। यदि आप अपने भाई या पड़ोसी से दुर्व्यवहार करते हैं, तो उसके मायने होते हैं कि आपका यह दुष्कृत्य भगवान के साथ हो रहा है।
प्रोफेसर मैक्समूलर के अनुसार ‘वेदान्त सभी तत्त्वज्ञानों की विचारधाराओं का सार है, जो विश्व के सभी धर्मों का समन्वय करता है, क्योंकि योरोप के विभिन्न मूर्धन्य तत्त्वज्ञानी जैसे प्लूटो, शोपेनहावर, हेगल, काण्ट, ह्यूम आदि सभी ने उच्चतम सत्य के बारे में जो कुछ बताया है, उसको आप वेदान्त में पाएंगे।
वैदिक धर्म का पालन करने वाला एक सच्चा ईसाई, सच्चा मुसलमान, सच्चा बौद्ध या सच्चा हिन्दु है, क्योंकि वह परमसत्ता की उपासना करता है और प्राणीमात्र में परमात्मा का दर्शन करता है, इसलिए विश्व के सभी पैगम्बरों और सन्तों का वह सम्मान करता है और पूज्य भाव दर्शाता है।’
इसी प्रकार जब हम सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं, किसी का भला करते हैं, तो मन प्रसन्न हो उठता है, उसी समय हम देवत्व का अनुभव करते हैं, क्योंकि अशान्त मन में शैतान रहा करता है। वेदान्त के अनुसार इसी धरती पर स्वर्ग और नरक दोनों हैं। वेदान्त की आधारशिला कर्म-सिद्धान्त है।
कर्मयोग का जितना विवेचन वेदान्त में है, वह कहीं और देखने को नहीं मिलता। इस प्रकार वेदान्त अध्यात्म के गहरे रहस्यों का उद्घाटन करता है एवं उन्हें सहज-सरल बनाकर सबके सामने रख देता है। उसे समझकर उसके सिद्धान्तों को जीवन में उतारा जा सके, तो यह जीवन धन्य बन सकता है।
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