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पितरों को खुश करना है, हर दिन 12 बजे करें यह काम
किरण राय
Updated Wed, 17 Sep 2014 02:50 PM IST
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शास्त्रों के अनुसार पितृऋण का देवऋण से भी ज्यादा महत्व है। कहा गया है कि इन दिनों पितर पृथ्वी पर विचरण करते हैं। जो व्यक्ति उनका तर्पण दानपुण्य करके उनकी भावनाओं को तृप्त रखते है उनसे तो वे प्रसन्न होकर जाते हैं। उस कुल में खुशियां बनी रहती हैं।
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यदि किसी कारणवश यह सब न हो सके तो उस तिथि को किसी गाय को ही दोपहर बारह बजे चारा खिला दें। अगर यह भी न हो सके तो सूर्य-देवता के समक्ष हाथ जोडकर अपने पूर्वजों को याद करें। ऐसी व्यवस्था न हो तो इस कर्म को विलुप्त होने से बचाने के विकल्प भी हैं।
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यदि संतान अलग अलग रहते हों तो वे अलग-अलग तर्पण कर सकते हैं। पुत्र के न होने पर पौत्र अथवा प्रपौत्र भी कर सकता है। पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध कर्म कर सकता है। यदि पति एवं पुत्र दोनों ही न हो तो उस कुल की पत्नी अपने पति के लिए यह कर्म कर सकती है।
विवाहित पुत्री या विधवा भी यह कर्म कर सकती है। तर्पण के लिए प्रातः स्नान करके देव-स्थल को गंगा-जल से शुद्ध करें। ब्राह्मण से तर्पण करवाएं। गाय, कुत्ता ,कौवा के लिए भोजन से तीन निवाला निकालें। पंडित को दान दें। अपने पूर्वजों को सम्मान से तृप्त करें। रिश्तेदारों को भी भोजन कराएं।