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वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए एक पल भी नहीं सोचते लोग, आखिर क्यों?

Sat, 26 May 2018 09:32 AM IST
डॉ. पूर्णिमा शर्मा
डॉ. पूर्णिमा शर्मा Updated Sat, 26 May 2018 09:32 AM IST
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why people do not even think once while running an ax on trees
tree cutting
जिन वृक्षों के लिए मांगलिक संस्कार किए गए हों, देवताओं के समान उपासना की जाती हो, उन्हें स्वार्थ के लिए कोई कैसे आघात पहुंचा सकता है?
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बहुतों को याद होगा अपने गांव घर का चबूतरा और उसके बीचोंबीच सर उठाकर खड़ा नीम का पेड़। किसी के घर में जामुन-आम-अमरूद के पेड़ मुस्कुराते खड़े रहते होंगे, तो किसी के घर के बाहर बरगद और पीपल के वृक्ष आग उगलती दोपहरी से राहत दिलाने के लिए शीतल हवा घर के भीतर पहुंचाते होंगे। 

तुलसी, गुलाब तो हर आंगन में सुगन्धित हवा लुटाते ही रहते होंगे। पर आज सब सपना भर रह गए हैं। आज लोग तुलसी विवाह, वट-पीपल के वृक्ष की पूजा जैसे अनुष्ठान आयोजन भी करते हैं, किन्तु सबके मूल में निहित महान और उदात्त भावना पर विचार नहीं करते।
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उलट इसके वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए एक पल भी नहीं सोचते। शुरू से हमें लकड़ी की आवश्यकता रही है। उस समय आवास की समस्या और प्रदूषण से लोग परिचित नहीं थे। फिर भी वृक्षों के साथ लोगों के भावात्मक संबंध थे। पौराणिक उल्लेख है कि भीष्म ने मुनि पुलस्त्य से पौधरोपण की विधि पूछी। पुलस्त्य ने पौधरोपण और उनकी देखभाल की विधि बताई भी। उसके अनुसार व्यक्ति के सोलह संस्कारों की तरह वृक्ष के भी संस्कार किए जाते थे।

बीज बोने के समय से लेकर उसके अंकुरित होने और पत्तियां, फूल, फल आदि लगने तक अनुष्ठान उत्सव होते थे। वृक्ष की पत्तियां तोड़ने के समय से लेकर तौर तरीके तक पूरा उपचार होता था। 
 

विधि विधान से पौधरोपण और वृक्षार्चन आज भी सामयिक है। आध्यात्मिक उपचारों के साथ नए वृक्षों के स्वागत संस्कार अकारण और निरुद्देश्य नहीं था। घोषित उद्देश्य लोगों के मन में वृक्षों के प्रति स्नेह सदभाव जगाना था।

जिन वृक्षों के लिए मांगलिक संस्कार किए गए हों, देवताओं के समान उपासना की जाती हो, उन्हें किसी स्वार्थ के लिए कोई आघात कैसे पहुंचा सकता है? वेदी और मण्डल बनाकर भी लोग वृक्षों के प्रति उसी तरह की भाव संवेदना पहुंचाते थे। वृक्षों के प्रति स्वाभाविक वात्सल्य एवं श्रद्धा थी।
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