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धर्म: क्यों हैं जैन धर्म में सूर्यास्त से पूर्व भोजन ग्रहण करने का विधान

Fri, 30 Aug 2019 09:23 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद
अनीता जैन, वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Fri, 30 Aug 2019 09:23 AM IST
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why in jainism religion to take food before sunset
jainism

यदि आयुर्वेद की मानें तो हमें सूर्यास्त से पूर्व भोजन कर लेना चाहिए। जैन धर्म में तो रात्रि भोजन करने की साफ-साफ मनाही है, क्योंकि जैन धर्म अहिंसा पर जोर देता है फिर चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो। रात में भोजन ग्रहण नहीं करने के दो कारण हैं पहला अहिंसा और दूसरा बेहतर स्वास्थ्य।

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वैज्ञानिक शोधों से भी स्पष्ट हो चुका है कि कीटाणु और रोगाणु जिन्हें हम सीधे तौर पर देख नहीं सकते वे सूक्ष्म जीव रात्रि में तेजी से फ़ैल जाते हैं। ऐसे में सूर्यास्त के बाद खाना बनाने और खाने से ये भोजन में प्रवेश कर जाते हैं। खाना खाने पर ये जीव पेट में चले जाते हैं और बीमारियों का कारण बनते हैं। वहीं जैन धर्म में इसे हिंसा माना गया है इसलिए रात्रि में भोजन को जैन धर्म एवं आयुर्वेद में निषेध बताया गया है।
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सेहत भी रहेगी दुरुस्त
सूर्यास्त से पहले भोजन करने से पाचन तंत्र ठीक रहता है। क्योंकि रात्रि में हमारी पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है। इसके अलावा जल्दी भोजन करने से सोने से पूर्व भोजन को पचने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है जिससे गैस,एसिडिटी एवं पेट में भारीपन आदि जैसे समस्याओं से बचा जा सकता है। यह भी माना जाता है कि हमारा पाचन तंत्र कमल के समान होता है जिसकी तुलना ब्रह्म कमल से की गई है। प्रकृति का नियम है कि सूर्य उदय के साथ कमल खिलता है और अस्त होने के साथ बंद हो जाता है। इसी तरह पाचन तंत्र भी सूर्य की रोशनी में सुचारु रूप से कार्य करता है और अस्त होने पर मंद पड़ जाता है। यदि हम रात्रि में भोजन करेंगे तो जितनी ऊर्जा भोजन से मिलनी चाहिए वह नहीं मिलेगी।


चातुर्मास का है बड़ा महत्व
वर्षा ऋतु के चार महीने में चातुर्मास का पर्व मनाया जाता है। इस दौरान एक ही स्थान पर रहकर तप, साधना एवं पूजा-अर्चना की जाती है। जैन धर्म के अनुसार इस मौसम में अनेकों प्रकार के कीड़े एवं सूक्ष्म जीव पैदा हो जाते है इस कारण अधिक चलने-फिरने से इन जीवों को नुकसान पहुँच सकता है। इसलिए जैन साधु एक ही स्थान पर बैठकर तप,स्वाध्याय एवं प्रवचन करते हैं और अहिंसा का पूरी तरह से पालन करते हैं।

चातुर्मास में ही जैन धर्म का सबसे बड़ा पर्व पर्युषण/दस लक्षण पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि जो जैन अनुयायी वर्षभर जैन धर्म का पालन नहीं कर पाते वे इन दस दिनों में रात्रि भोजन का त्याग,ब्रह्मचर्य,स्वाध्याय,जप-तप मांगलिक प्रवचनों का लाभ तथा मुनि महाराजों की सेवा कर उनके बताए मार्गों पर चलकर अपने जीवन को सुखद बना सकते हैं।

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