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गजब, सो कर उठेंगे और तुलसी संग विवाह करेंगे भगवान

Mon, 03 Nov 2014 05:31 PM IST
Updated Mon, 03 Nov 2014 05:31 PM IST
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tusi vivaah with shaligram story devprabodhni ekadashi

आज देवप्रबोधनी एकादशी है। इस एकादशी का शास्त्रों में बड़ा महत्व बताया गया है। कारण यह है कि इस दिन चार महीने के बाद भगवान विष्णु योगनिद्रा से जगते हैं। भगवान विष्णु जब तक सोते हैं तब तक कोई भी शुभ काम जैसे शादी, जनेऊ, मुंडन, मकान की  नींव देने का काम नहीं किया जाता है।

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लेकिन देव प्रबोधनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जगते ही सभी शुभ काम शुरु हो जाते हैं। इस दिन को शास्त्रों में बड़ा ही शुभ दिन और अनबुझ मुहूर्त के रुप में भी मान्यता प्राप्त है।
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इसका कारण यह है कि इस दिन भगवान विष्णु नींद से जगते हैं और इसी दिन वृंदा यानी तुलसी के साथ इनके शालिग्राम रुप की शादी होती है। इसलिए देव प्रबोधनी एकादशी के दिन विवाह संस्कार के लिए मुहूर्त देखने की जरुरत नहीं होती है।
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तुलसी संग विवाह करने का पुण्य जानिए

tusi vivaah with shaligram story devprabodhni ekadashi

शास्त्रों में बताया गया है कि देवप्रबोधनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराना बड़ा ही पुण्यदायी होता है। जो व्यक्ति तुलसी के साथ शालिग्राम का विवाह करवाता है उनके दांपत्य जीवन में आपसी सद्भाव बना रहता है और मृत्यु के पश्चात उत्तम लोक में स्थान मिलता है।

इन्हीं मान्यताओं के कारण देवप्रबोधनी एकादशी के दिन मंदिरों में तुलसी और शालिग्राम का विवाह करवाया जाता है। कई घरों में भी लोग इस नियम का पालन करते हैं और शाम के समय पूजा घर से लेकर तुलसी के पौधे के पास तक भगवान के चरण चिन्ह और रंगोली बनाते हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु तुलसी से विवाह करने जा रहे हैं।

तुलसी और शालिग्राम का विवाह कैसे हुआ

tusi vivaah with shaligram story devprabodhni ekadashi

एक समय जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर हुआ। इसका विवाह वृंदा नामक कन्या से हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। इसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था।

इसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपने अजेय होने पर इसे अभिमान हो गया और स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे।

भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलांधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गयी और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया।

देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे अतः वृंदा के शाप को जिवित रखने के लिए उन्होनें अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।


और भगवान विष्णु की पत्नी बन गई तुलसी

tusi vivaah with shaligram story devprabodhni ekadashi

भारत में शालिग्राम पत्थर नर्मदा नदी से प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा।

मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।

भगवान विष्णु को दिया शाप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गयी। वृंदा के राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाये रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया।

इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।

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