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महाभारत युद्ध में तब सूर्य ग्रहण ने बचाई अर्जुन की जान

Thu, 19 Mar 2015 03:24 PM IST
Updated Thu, 19 Mar 2015 03:24 PM IST
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sun eclipse during mahabharat save arjun life

ऐसी मान्यता है कि महाभारत का युद्घ आज से करीब 5000 साल पहले हरियाणा के करुक्षेत्र में लड़ा गया था। यह युद्घ यूं तो पारिवारिक युद्घ था लेकिन पूरा भारतवर्ष दो खेमों में बंटा था। कौरव और पाण्डवों के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने के लिए इस युद्घ में भारत के सभी छोटे-बड़े योद्घा रण भूमि में डटे थे।

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एक तरफ कौरवों की विशाल सेना थी तो दूसरी ओर भगवान श्री कृष्ण की छत्रछाया में पाण्डवों की सेना थी जो कौरवों की सेना के मुकाबले काफी कम थी। इसके बावजूद पाण्डव सेना कौरवों पर भारी पड़ रही थी। ऐसे में कौरवों ने एक चाल चली।
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कौरवों ने देखा कि पाण्डवों की सबसे बड़ी ताकत है अर्जुन। इसलिए अर्जुन को किसी तरह युद्घ भूमि से निकालकर दूर ले जाया जाए और इसके बाद युधिष्ठिर को बंदी बना लिया जाए। अगर ऐसा हो जाता तो कौरवों की जीत निश्चित थी।

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तब निराश अर्जुन चले आत्मदाह करने

sun eclipse during mahabharat save arjun life

कौरव अर्जुन को युद्घ भूमि से बाहर ले जाने की योजना में सफल हुए और दूसरी ओर युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना कर दी। लेकिन अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने चक्रव्यूह को तोड़ना शुरु कर दिया और छह दरवाजों को तोड़ता हुआ अंतिम दरवाजे में पहुंच गया।

यहां पर कौरवों की सेना ने अकेले अभिमन्यु को एक साथ घेर लिया और दुर्योधन के जीजा और सिंधु प्रदेश के राजा जयद्रथ ने पीछे से अभिमन्यु पर वार कर दिया। इसके बाद सभी योद्घाओं ने मिलकर अभिमन्यु की हत्या कर दी।

जब यह खबर अर्जुन को मिली तो उसने यह प्रतीज्ञा ली कि अगर अगले दिन के युद्घ में शाम ढ़लने तक जयद्रथ वध नहीं कर पाया तो आत्मदाह कर लूंगा। और परिस्थिति कुछ ऐसी बनी की अर्जुन निराश हो गए और आत्मदाह करने चल पड़े।

कृष्ण ने फैलायी अजब माया

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अर्जुन की प्रतीज्ञा की खबर पाते ही जयद्रथ डर से कांपने लगा और अगले दिन युद्घ क्षेत्र में आने से भी मना कर दिया। लेकिन दुर्योधन और दूसरे कौरव योद्घाओं के द्वारा यह समझाने पर कि आज पूरी सेना तुम्हारी रक्षा में खड़ी रहेगी और अर्जुन को तुम तक आने नहीं देगी।

इस बात को सुनकर जयद्रथ युद्घ क्षेत्र में आया और महाभारत का युद्घ आरंभ हो गया। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि मेरे रथ को जयद्रथ की ओर ले चलिए। अर्जुन का रथ जयद्रथ की ओर चल पड़ा लेकिन कौरव योद्घा अर्जुन को आगे बढ़ने नहीं दे रहे थे।

सूर्य अपनी गति से चला जा रहा था और अर्जुन की चिंता बढ़ रही थी। श्री कृष्ण समझ गए कि इन स्थितियों में जयद्रथ का वध असंभव है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपनी माया से सूर्य को ढ़क दिया सभी लोग यह समझने लगे कि शाम हो गई है और कौरव सेना झूमने लगी कि अब अर्जुन आत्मदाह कर लेगा और महाभारत युद्घ में अब जीत निश्चित है।

इस तरह जयद्रथ का वध करने में अर्जुन सफल हुए

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अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष रख दिया और आत्मदाह करने बढ़ चले। लेकिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि योद्घा को निराश होने की बजाय हमेशा अपना हथियार थामे रहना चाहिए।

दूसरी ओर उत्साहित जयद्रथ अर्जुन की ओर बढ़ा और आत्मदाह करने के लिए कहने लगा। तभी श्रीकृष्ण ने अपनी मया समेट ली और आसमान में सूर्य चमकने लगा। कौरव योद्घा सूर्य को देखकर घबरा गए और जयद्रथ भागने लगा। श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन उठाओ अपना गांडीव और अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो।

अर्जुन ने जैसे ही गांडीव पर वाण चढ़ाया श्री कृष्ण ने कहा कि जयद्रथ को उसके पिता वृद्धक्षत्र से वरदान प्राप्त है कि जयद्रथ का सिर भूमि पर गिराने वाले के सिर में धमाका होगा और उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए अपना वाण इस तरह चलाओ के यहां से सौ योजन दूर तपस्या कर रहे इसके पिता की गोद में जयद्रथ का सिर जा कर गिरे।

अर्जुन ने दिव्य वाण चलाया और जयद्रथ का सिर धड़ से कटकर सौ योजन दूर बैठे उसके पिता की गोद में जा गिरा। जयद्रथ के पिता ने जब अपने पुत्र का सिर गोद में देखा तो घबराकर उठ गए। पिता की गोद से भूमि पर सिर के गिरते ही दोनों के सिर में धमाका हुआ और जयद्रथ परलोक चला गया और अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई।

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