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जिनके पुत्र नहीं हैं क्या वह प्रेत बनकर भटकते रहते हैं?

Fri, 19 Sep 2014 03:29 PM IST
Updated Fri, 19 Sep 2014 03:29 PM IST
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shradh importance in shastra

शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र के हाथों से दिया गया पिण्डदान पितरों को प्राप्त होता है। जिनका श्राद्घ और पिण्डदान नहीं होता है उन्हें मुक्ति नहीं मिलती है। ऐसे व्यक्ति कई-कई वर्षों तक प्रेत बनकर भटकते रहते हैं। इस संदर्भ में एक वैश्य की कथा गुरुड़ पुराण में बताई गई।

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एक वैश्य था जिसकी कोई संतान नहीं थी। इन्होंने अपने अपने जीवनकाल में खूब दान पुण्य किए लेकिन मृत्यु के बाद श्राद्घ और पुण्डदान नहीं मिलने के कारण वह प्रेत बन गया। इसलिए शास्त्र कहता है कि मृत्यु के बाद हर व्यक्ति का पिण्डदान और श्राद्घ करना चाहिए।
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शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि जिनके पुत्र हैं उनकी पुत्री भी अपने पिता का पिण्डदान कर सकती है। लेकिन पुत्र के होने पर पुत्र को ही पिता का पिण्डदान करना चाहिए। इसलिए यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति मुक्ति के लिए पुत्र की ही कामना करे। पुत्री भी अपने माता-पिता को मुक्ति दिला सकती है।

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जिनके कोई संतान नहीं हो उनकी मुक्ति कैसे?

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जिनके कोई संतान नहीं हो उनकी मुक्ति कैसे होगी इस विषय में वशिष्ठ स्मृति में कहा गया है कि पत्नी चाहे तो पति का श्राद्घ कर सकती है। सगे भाइयों को भी श्राद्घ का अधिकार प्राप्त है।

इनके द्वारा किया गया श्राद्घ मृतक को प्राप्त हो जाता है। अगर सगे भाइयों में से किसी के पुत्र संतान है तो यह श्राद्घ कर सकता है।

इनके द्वारा किया गया श्राद्घ अपने पुत्र द्वारा किए श्राद्घ के समान फलदायी होता है। इनके अलावा दामाद और नाती को भी श्राद्घ का अधिकार प्राप्त है।

ऐसे व्यक्तियों का श्राद्घ नहीं किया जाता

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तर्पण करते समय अंगूठे से ही पिंड पर जलांजलि समर्पित करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि अंगूठे से दी गई जलांजलि पितरों तक पहुंचती है।

तर्पण करते वक्त अंगूठे से ही पिंड पर जलांजलि दी जाती है। कहा गया है कि अंगूठे के जरिए दी गई जलांजलि सीधे पितरों तक पहुंचती है।

बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिंडदान नहीं किया जाता। अर्थात् श्राद्ध उन्हीं का होता है, जिनको मैं और मेरे की आसक्ति होती है।

श्राद्ध संपन्न होने पर कौवे, गाय, कुत्ते, चींटी तथा भिखारी को भी यथा नियम भोजन वितरित करना चाहिए। पितृ पक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर, परिवार व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।

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