इसलिए रक्षाबंधन है शिव जी के साथ मां लक्ष्मी की कृपा पाने का दिन
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पूरे महीने पृथ्वी भ्रमण करने के बाद शिव श्रावण की यात्रा का अंतिम दिन मनाएंगे। पूर्णिमा के दिन जब चंद्रमा अपनी संपूर्ण कलाओं और सहस्रों शीतल रश्मियों से संसार को आच्छादित कर देते हैं, लक्ष्मी पाताल लोक में बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपने पति विष्णु को मुक्त करा लेती हैं तो इसी दिन कैलास की ओर प्रस्थान करती हैं।
इस दिन रुद्राभिषेक करना, पंचाक्षर मंत्र का जाप, जप-तप, पूजा-पाठ और दन पुण्य विशेष महत्व रहता है। वेदपाठी ब्राह्मणों के लिए यह दिन श्रावणी उपाकर्म के लिए नियत हैं।
इस दिन संपन्न होने वाले आध्यात्मिक विधान में षट्कर्म, तीर्थों का आह्वान, संकल्प, पंचगव्य स्नान सहित शिखा सिंचन, नवीन यज्ञोपवीत धारण और बाद में विष्णु पूजन किया जाता है।
तो लक्ष्मी और भगवान शिव करेंगे मनोकामना पूरी
प्रजापिता ब्रह्मा, चारों वेद और ऋषियों का पुरुष सूक्त के मंत्रों द्वारा आवाहन करना चाहिए। विधान पूर्ण होने पर आचार्य के हाथों रक्षाबंधन बंधवाया जाता है।
यज्ञोपवीत धारण करने वाले ब्राह्मण अपनी वाणी की पवित्रता, सत्याचरण, मन, वचन और कर्म की पवित्रता का संकल्प इसके बाद विष्णु-लक्ष्मी के दर्शन से सुख, और समृद्धि की प्राप्ति तो होती ही है।
कहते हैं कि इस पूर्णिमा के दिन पर शिवलिंग पर शहद और पंचामृत का लेप करने पर कर्ज से मुक्ति पा लेता हैं विद्यार्थियों को इसदिन शिवलिंग पर मिश्री और दूध के अमृततुल्य मिश्रण का लेप करते हुए उत्तम विद्या की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करना करना चाहिए अविवाहित अथवा विवाह में विलंब हो रही महिलाओं को गन्ने के रस से अभिषेक करना चाहिए उनके जीवन में उत्तम दांपत्य सुख की प्राप्ति होगी।