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आस्था के वो दरबार, जो बनाते हैं नेताओं की सरकार
मधुकर मिश्र
Updated Tue, 30 Oct 2018 03:17 PM IST
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temple of india
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विधानसभा चुनाव के चरम पर आते ही क्या प्रत्याशी और क्या पार्टी के मुखिया अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर तरह के रास्ते अपना रहे हैं। राजनीति के मैदान में बाजी मारने के लिए इन दिनों तमाम छोटे-बड़े नेताओं का तीर्थ स्थानों में जाकर पूजा-अर्चना और मन्नतें मांगने का क्रम जारी है।
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सत्ता पर काबिज होने की कामना लिए कहीं कोई खुले आम जाकर देवी-देवताओं के दरबार में माथा टेक रहा है तो कहीं कोई गुप्त तरीके से हवन-अनुष्ठान करवा रहा है। आइए जानते हैं आस्था से जुड़े ऐसे ही धार्मिक स्थलों के बारे में जहां मिलता है राजसत्ता का आशीर्वाद —
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सरकार के लिए महाकाल के दरबार
खबरों की खबर में हैं कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी, जिन्होंने हाल ही में तीर्थ नगरी उज्जैन के महाकाल मंदिर में जाकर जीत की कामना के साथ महाकाल का विशेष पूजन किया है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है, इसी महाकाल के मंदिर में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी सपत्नीक शिव की साधना करने के लिए अक्सर पहुंचते रहते हैं। जिन्हें सूबे की सत्ता से हटाने के लिए राहुल गांधी इन दिनों एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं।
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शक्ति-साधना और विजय की कामना
चुनावी वैतरणी पार लगाने के लिए उत्तर भारत में मां विंध्यवासिनी का पावन धाम भी काफी प्रसिद्ध है। विंध्याचल धाम दस महाविद्या का प्रधान केंद्र है। जहां राजनेता जीत की कामना के लिए तंत्र-मंत्र का विशेष रूप से सहारा लेते हैं। पार्टी में बड़े पद पाने से लेकर चुनाव जीत के लिए अक्सर दिग्गज नेता नेता माता के दरबार में माथा टेकते रहे हैं।
त्रिकोण यंत्र पर स्थिति मां विंध्यवासिनी एक ऐसा जागृत शक्तिपीठ है, जहां चुनावी बिगुल बजते ही नेताओं का काफिला पहुंचना शुरु हो जाता है। यहां जगदंबा अपनी त्रिगुणात्मक शक्ति महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में ही त्रिकोण का निर्माण करतीं हैं।
ऐसे में इस सिद्ध स्थल पर चुनाव के दौरान जीत की कामना लिए तमाम नेता गुप्त साधना करते और करवाते हैं। शक्ति के इस पावन धाम को राजनेताओं के लिए मनौती के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। देश का शायद ही कोई राजनेता हो जो मां के चरणों में शीश न झुकाया हो।
जहां मिलता है राजसत्ता का आशीर्वाद
मध्य प्रदेश के झांसी जिले के दतिया में स्थित मां पीतांबरा का एक ऐसा शक्तिपीठ है, जिसके बारे में मान्यता है कि वहां से कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं जाता है। माता सभी की मनोकामनाएं पूरी करती है। क्या राजा और क्या रंक सभी पर माता की समान रूप से कृपा बरसती है। मां पीतांबरा को राजसत्ता की देवी माना जाता है और इसी कामना को लिए भक्तगण यहां आकर गुप्त पूजा अर्चना करते हैं।
ऐसे में माता के दरबार में प्रतिदिन होने वाले चमत्कार राजनेताओं को उनके दरबार में बरबस खींच लाते हैं। माता को मां बगुलामुखी का स्वरूप माना जाता है। मां पीतांबरा शत्रु नाश की अधिष्ठात्री देवी हैं, ऐसे में राजनेता शक्ति की साधना के जरिए राजसत्ता को हासिल करने और विरोधी को शिकस्त देने के लिए इस पावन दरबार में विशेष रूप से पहुंचते हैं। शत्रु चुनावी मैदान में हो युद्ध के मैदान में, माता के आशीर्वाद से व्यक्ति को उस पर विजय अवश्य मिलती है।
कहते हैं कि भारत-चीन युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री ने देश की रक्षा की कामना लिए मां बगलामुखी की प्रेरणा से 51 कुंडीय महायज्ञ कराया गया था। जिसके 11वें दिन अंतिम आहुति के साथ चमत्कारिक रूप से चीन ने अपनी सेनाएं वापस बुला ली थीं। इंदिरा, राजीव के बाद गांधी परिवार की तीसरी पीढ़ी यानी राहुल गांधी ने भी हाल ही में शक्ति के इस पावन धाम में विजय की कामना के साथ दर्शन एवं पूजन किया था।
तंत्र की ताकत और विजय का मंत्र
51 शक्तिपीठों में सबसे प्रसिद्ध मां कामख्या का पावन धाम तंत्र-मंत्र की साधना के लिए जाना जाता है। कहते हैं कि इस सिद्धपीठ पर हर किसी कामना पूरी होती है। इसीलिए इस मंदिर को कामाख्या कहा जाता है। इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है।
यह देश के उन चंद हिंदू मंदिरों में से एक है, जहां पर आज भी जानवरों की बलि दी जाती है। चमत्कारों और रोचक तथ्यों से भरे इस शक्तिपीठ में विजय की कामना लिए क्या संतरी और क्या मंत्री माथा टेकने जरूर पहुंचता है। विशेष रूप से चुनावी दंगल में कूदने से पहले हर छोटा-बड़ा नेता माता के दरबार में पहुंचकर जीत का आशीर्वाद मांगता है।
इसी साल पूर्वोत्तर के राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने गुवाहाटी में कामाख्या मंदिर में माथा टेकने के बाद ही प्रचार अभियान की शुरुआत की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चुनाव प्रचार के दौरान जीत की कामना लिए मंदिर में जाकर माता के दर्शन किए थे।