Pitru Paksha 2021: पितरों की प्रसन्नता के लिए करें श्राद्ध, जानें किस तिथि को किसका करें श्राद्ध
शास्त्रों में कहा गया है कि, जो प्राणी वर्ष पर्यन्त्र पूजा-पाठ आदि नहीं करते वे अपने पितृ का श्राद्ध करके भी ईष्ट कार्य सिद्धि और पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
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श्राद्ध के विषय में शास्त्र कहते हैं कि-श्राद्धात् परतरं नान्यच्छेयस्कर मुदाहृतम। तस्मात् सर्व प्रयत्नेन श्राद्धं कुर्यात विचक्षणः। अर्थात- इस संसार में दैहिक, दैविक, और भौतिक तीनों तापों से मुक्ति पाने के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई अन्य उपाए नहीं है। इसीलिए मनुष्य को यत्न पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। पित्रों के लिए समर्पित माह 'श्राद्धपक्ष' भादौं पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक मनाया जाता है। परमपिता ब्रह्मा ने यह पक्ष पितरों के लिए ही बनाया है। आदिकाल में सूर्यपुत्र यम ने परमेश्वर श्रीशिव की बीस हजार वर्ष तक घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर वरदान के रूप में भगवान शिव ने उन्हें पितृलोक का भी अधिकारी बनाया। शास्त्रों में कहा गया है कि, जो प्राणी वर्ष पर्यन्त्र पूजा-पाठ आदि नहीं करते वे अपने पितृ का श्राद्ध करके भी ईष्ट कार्य सिद्धि और पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
श्राद्ध करने की तिथियां
वर्षपर्यंत श्राद्ध करने के छियानबे अवसर आते हैं। ये हैं बारह महीनें की बारह अमावस्या, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के प्रारम्भ की चार तिथियां, मनुवों के आरम्भ की चौदह मन्वादि तिथियां, बारह संक्रांतियां, बारह वैधृति योग, बारह व्यतिपात योग, पंद्रह महालय-श्राद्ध पक्ष की तिथियां, पांच अष्टका, पांच अन्वष्टका और पांच पूर्वेद्युह ये श्राद्ध करने छियानबे अवसर हैं। श्राद्धपक्ष जब आता है तो 'आत्मानम् गुर्विणी गर्भमपि प्रीणाति वै यथा। दोहदेन तथा देवाः श्राध्दैह:...अर्थात श्राद्ध का समय आ गया है ऐसा जानकर पितरों को प्रसन्नता होती है। वे परस्पर ऐसा विचार करके उस श्राद्ध में मन के समान तीव्र गति से आ पहुचते हैं। अंतरिक्ष गामी पितृगण श्राद्ध में ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करते हैं, जिन ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन कराया जाता है उन्ही के शरीर में प्रविष्ट होकर पितृगण भी भोजन करते हैं उसके बाद अपने कुल के श्राद्ध कर्ता को आशीर्वाद देकर पितृलोक चले जाते हैं।
किस तिथि को किसका करें श्राद्ध
किसी भी माह की जिस भी तिथि में परिजन की मृत्यु हुई हो, श्राद्धपक्ष में भी उसी तिथि में उस पितृ का श्राद्ध करना चाहिए। कुछ खास तिथियां भी हैं जिनमें किसी भी प्रकार से मृत हुए परिजन का श्राद्ध किया जाता है। सौभाग्यवती अर्थात पति के रहते ही जिस महिला की मृत्यु हो गयी हो, उनका श्राद्ध नवमी तिथि (मातृ नवमी) में किया जाता है। ऐसी स्त्री जो मृत्यु को तो प्राप्त हो चुकी किन्तु उनकी तिथि नहीं पता हो तो उनका भी श्राद्ध मातृनवमी को ही करने का विधान है। सभी वैष्णव सन्यासियों का श्राद्ध एकादशी में किया जाता है जबकि शस्त्रघात, आत्म हत्या, विष, और दुर्घटना आदि से मृत लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है। सर्पदंश, ब्राह्मण श्राप, वज्रघात, अग्नि से जले हुए, दंतप्रहार से, हिंसक पशु के आक्रमण से, फांसी लगाकर मृत्य, कोरोना जैसी महामारी, क्षय रोग, हैजा आदि किसी भी तरह की महामारी से, डाकुओं के मारे जाने से हुई मृत्यु वाले प्राणी श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या के दिन करना चाहिए। जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो उनका भी अमावस्या को ही करना चाहिए।
तिल और कुश से करें श्राद्ध-तर्पण
सभी पितृ लोकों के स्वामी भगवान जनार्दन के ही शरीर के पसीने से तिल की और रोम से कुश की उत्पत्ति हुई है इसलिए तर्पण और अर्घ्य के समय तिल और कुश का प्रयोग करना चाहिए। श्राद्ध में ब्राह्मण भोज का सबसे पुण्यदायी समय कुतप, दिन का आठवां मुहूर्त 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक का समय सबसे उत्तम है। शास्त्र कहते हैं कि 'श्राद्धं न कुरुते मोहात तस्य रक्तं पिबन्ति ते। अर्थात जो श्राद्ध नहीं करते उनके पितृ उनका ही रक्तपान करते हैं पश्च्यात साथ ही पितरस्तस्य शापं दत्वा प्रयान्ति च। अतः अमावस्या तक प्रतीक्षा करके अपने परिजनको श्राप देकर पितृलोक चले जाते हैं। अपने पितरों के प्रति श्रद्धा रखना भी श्राद्ध की श्रेणी में आता है अतः जो श्रद्धा से दें वही श्राद्ध है।