ओशो जन्मदिन विशेष: जानें कौन थे ओशो, जिनसे डर गया था विश्वशक्ति अमेरिका
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अपने आध्यात्मिक विचारों से क्रांति लाने वाले ओशो का जन्म 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में हुआ था। बचपन में ओशो का नाम चंद्रमोहन था। ओशो ने अपनी शिक्षा जबलपुर में पूरी की और बाद में वे जबलपुर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी रहे। आगे चलकर उन्होंने अपनी नौकरी को त्याग दिया और संन्यासी जीवन की ओर बढ़ चले। साल 1990 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।
जब ओशो से घबराया अमेरिका
उन्होंने देश-विदेश में धर्म और अध्यात्म के विषय में कई प्रवचन दिए। जब वे अमेरिका में गए तो उनका ये प्रवास विवादों में रहा। उन्होंने अमेरिका के ओरेगॉन में अपना एक आश्रम बनाया था। यहां उनके शिष्यों की संख्या काफी तेजी से बढ़ने लगी। कहते हैं ओशो ने यहां आश्रम के लिए करीब 64 हज़ार एकड़ जमीन खरीद ली थी।
अमेरिकी जेल में बिताया समय
उनके शिष्यों ने इस जगह का नाम रजनीशपुरम रखा दिया। लेकिन स्थानीय लोगों और सरकार के विरोध के कारण जगह का नाम रजिस्टर्ड नहीं हो सका। बाद में अमेरिकी सरकार ने उनपर अप्रवास नियमों का उल्लंघन करने के मामले में कई केस दर्ज किए। इस बीच उन्हें जेल भी जाना पड़ा। कहा जाता है कि इसी दौरान उन्हें जेल में अधिकारियों ने थेलियम नामक धीरे असर वाला जहर दे दिया था। इसके बाद ओशो अमेरिका छोड़कर भारत लौट आए और पूना के आश्रम में रहने लगे। यहीं उन्होंने अंतिम सांस लीं।
"केवल वो लोग जो कुछ भी नहीं बनने के लिए तैयार हैं प्रेम कर सकते हैं।"
"यहां कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है। हर कोई अपनी तकदीर और अपनी हकीकत बनाने में लगा है।"
"अगर आप सच देखना चाहते हैं तो ना सहमती में और ना असहमति में राय रखिए।"
"कोई चुनाव मत करिए, जीवन को ऐसे अपनाइए जैसे वो अपनी समग्रता में है।"
"जब प्यार और नफरत दोनों ही ना हो तो हर चीज साफ और स्पष्ट हो जाती है।"
"जीवन ठहराव और गति के बीच का संतुलन है।"