विवाह करने से मना करने पर नारद को मिला ये कैसा श्राप

राकेश/इंटरनेट डेस्क Updated Sun, 26 May 2013 10:18 AM IST
narad jyanti special story of narad and brahama
देवर्षि नारद व्यास बाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेव आदि के गुरु हैं। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का महाग्रंथ श्रीमदभागवत मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पावन आदर्श चरित्र से परिपूर्ण ग्रंथ रामायण देवर्षि नारदजी से ही मनुष्य को प्राप्त हुए हैं। नारदजी ने प्रह्लाद, ध्रुव, राजा अंबरीष आदि महान भक्तों को भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। यह भगवान के सर्वश्रेष्ठ भक्तों में हैं। इन्हें भगवान का मन भी कहा गया है।
नारद पुराण की कथा के अनुसार सृष्टि रचना के आरंभ में ब्रह्मा जी ने आठ मानस पुत्रों को जन्म दिया। देवर्षि नारद ब्रह्मा जी के कंठ से उत्पन्न हुए। ब्रह्मा जी ने सभी पुत्रों से कहा कि विवाह करके सृष्टि का विस्तार करो। नारद ने विवाह करने से इंकार कर दिया। इन्होंने कहा कि मैं केवल भगवान पुरूषोत्तम की भक्ति करना चाहता हूँ। जो भगवान को छोड़कर अन्य विषयों एवं भोगों में मन लगाये उससे अधिक मूर्ख कौन होगा! विषय तो स्वप्न के समान नश्वर, तुच्छ एवं विनाशकारी हैं।’’

विवाह का आदेश न मानने पर ब्रह्मा जी ने क्रोध में आकर नारदजी को श्राप दे दिया, ‘‘तुमने मेरी आज्ञा नहीं मानी, इसलिये तुम्हारा समस्त ज्ञान नष्ट हो जायेगा और तुम गन्धर्व योनी को प्राप्त कर कामिनीयों के वशीभूत हो जाओगे।’’ इसलिए नारद जी पहले गंदर्भ माने जाते हैं।

नारद विवाह नहीं करना चाहते थे लेकिन ब्रह्मा के श्राप के कारण अब उन्हें कई स्त्रियों के साथ रहने का दंड मिल चुका था। इससे नारद दुःखी हुए। नारदजी ने कहा आपका श्राप स्वीकार है लेकिन एक आशीर्वाद दीजिए कि जिस-जिस योनि में मेरा जन्म हो, भगवान कि भक्ति मुझे कभी न छोड़े एवं मुझे पूर्व जन्मों का स्मरण रहे। दो योनियों में जन्म लेने के बाद भगवान की भक्ति के प्रभाव से नारद परब्रह्मज्ञानी हो गये।

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