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इस तीर्थ स्थान की यात्रा से कैलाश यात्रा का पुण्य मिलता है

Fri, 19 Dec 2014 01:17 PM IST
Updated Fri, 19 Dec 2014 01:17 PM IST
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mallikarjun jyotirling tirth yatra kailash mansarovar

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद हवाई अड्डे से लगभग दो सौ साठ किमी दूर करनूल जिले के नल्ला-मल्ला नामक घने जंगलों के मध्य श्रीशैलम पर्वत है, जिसे दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं। इसी चोटी पर भगवान शिव श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। इसके मध्य उत्तर दिशा में कृष्णा नदी प्रवाहित हो रही है। ज्योतिर्लिंग तक पहुंचने के लिए इन्हीं घने जंगलों के बीच सड़क मार्ग के जरिए लगभग 40 किलोमीटर अंदर से होकर गुजरना पड़ता है।

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घने जंगल में सभी जीव जंतु की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रशासन के जरिए मार्ग पर बस या कार की अधिकतम रफ्तार तीस किलोमीटर तय की गई है। इस जंगली रास्ते को पार करके कुछ ही किलोमीटर की दूरी से श्री शैल पर्वत की चढ़ाई आरंभ हो जाती है। मंदिर परिक्षेत्र के प्रवेश करने से पहले ही गणेश जी का विशाल मंदिर है।
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मंदिर रात्रि साढ़े दस बजे तक खुला रहता है। दर्शन के लिए यहां लंबी कतार लगी थी। अलग-अलग राज्यों से आए भक्त तरह-तरह के वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे। काफी अंदर चलने के बाद नंदी जी की विशाल मूर्ति के दर्शन हुए। यहां से कुछ ही दूरी चलने के बाद सभी ईश्वरों के स्वामी श्री मल्लिकार्जुन के दर्शन हुए। ज्योतिर्लिंग का गर्भगृह एवं आकार छोटा है।

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मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और इसके प्रकट होने की कथा

mallikarjun jyotirling tirth yatra kailash mansarovar

इस ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने का कारण उस दौड़ को माना जाता है जिसमें विजयी होकर भगवान गणेश प्रथम पूज्य बन गए। कार्तिकेय ने ब्रह्माण्ड की परिक्रमा की लेकिन गणेश ने सिर्फ माता-पिता की परिक्रमा करके प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद पा लिया।

इस घटना से निराश होकर कार्तिकेय कैलाश पर्वत को त्याग कर दक्षिण चले आए और रुठ कर दक्षिण में कौंच पर्वत पर आकर रहने लगे।

अपने पुत्र को नाराज हुआ जानकर भगवान शिव देवी पार्वती के साथ यहां पधारे। लेकिन रुठे हुए कार्तिकेय ने कैलाश जाने से मना कर दिया। इसके बाद शैल पर्वत पर एक ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ जो मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कहलाया। भगवान शिव और देवी पार्वती अपने पुत्र के साथ इस ज्योतिर्लिंग के रुप में निवास करते हैं।

कहते हैं यहां शिव की पूजा करने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है। यहां आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए होटल और धर्म शालाओं की कमी नहीं है।

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