भगवान शिव की पूजा इस रुप में भी होती है, आपने सोचा नहीं होगा
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भगवान शिव को शास्त्रों और पुराणों में परमेश्वर बताया गया है। शिव वह शक्ति हैं जो आदि और अनंत से परे हैं। लेकिन भगवान शिव ने मनुष्य को यह सौभाग्य प्रदान किया जिससे वह मनुष्यों के भगवान ही नहीं बल्कि उनके खास रिश्तेदार भी बन गए हैं।
शिव उत्तराखंड के अधिदेव माने जाते हैं साथ ही इन्हें उत्तराखंड में दामाद का स्थान प्राप्त है। यहां पौराणिक देव शिव की उपासना वैदिक होती है। कुछ स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना यहां नृत्यमयी पद्धति यानी जागरों से होती है। विश्वास है कि अनुष्ठान विशेष में वाद्य यंत्रों और गाथाओं के साथ शिव और देवता प्रकट होते हैं।
भैरों या भैरव, बिनसर आदि के रूप में शिव यहां मानव पर अवतरित होते हैं। भैरवों के इन रूपों-काल, बाल, बटुक आदि के अलावा सत्यनाथ के रूप में भी यहां शिव उपास्य है। सत्यनाथ के उपासक नाथपंथी लोग होते हैं। घंटाकर्ण यानी घंडियाल को भी उत्तराखंड में शिव रूप में पूजा जाता है।
हर युग में भगवान शिव की हुई शादी
शिवभक्त घंटाकर्ण यक्षदेव के मोक्ष मांगने पर शिव ने उसे विष्णु के पास भेजा। विष्णु ने घंटाकर्ण को परम पद प्रदान करने का वरदान देकर कहा कि इस क्षेत्र में आने वाले को तेरी पूजा के बाद ही सुफल मिलेगा। केदारखंड का तात्पर्य है शिव की भूमि। यह नाम यहां शिव की महत्ता व्यक्त करता है।
पार्वती का मायका यहां होने के कारण शिव को जमाई माना गया है। उन्हें नंदा का पति भी माना जाता है। नंदा गढ़वाल-कुमायूं की आराध्या देवी हैं।
शिव का विवाह आदि शक्ति के विभिन्नरूपों से होने की बात कही जाती है। सतयुग में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती, त्रेता में हिमालय पुत्री पार्वती और द्वापर में नंद की पुत्री नंदा से महादेव का विवाह होने की बातें वर्णित हैं। नंदा के जागर गीतों में कष्टसाध्य और निर्जन वातावरण का मर्मस्पर्शी वर्णन है।