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MahaShivratri 2024: शिवजी के शीश पर क्यों सुशोभित हैं चंद्रमा? जानिए दो रोचक पौराणिक कथाएं
Tue, 05 Mar 2024 07:34 AM IST
आशिकी पटेल
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आशिकी पटेल
Updated Tue, 05 Mar 2024 07:34 AM IST
सार
MahaShivratri 2024: शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत के आधार हैं। अतः मनुष्य निष्काम हो या सकाम, सबको भगवान सदाशिव की आराधना करनी चाहिए। शिवपुराण में वर्णित है, जिसमें शिवजी द्वारा चंद्रमा के प्राणों की रक्षा करने के लिए उन्हें अपनी जटाओं में विराजित किया गया है।
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भगवान शिव के मस्तक पर क्यों विराजते हैं चंद्रमा
- फोटो : iStock
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विस्तार
MahaShivratri 2024: देवों के देव भगवान शिव ऐसे देव हैं, जो थोड़ी सी भक्तिभाव से की गई पूजा से शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करते हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत के आधार हैं। अतः मनुष्य निष्काम हो या सकाम, सबको भगवान सदाशिव की आराधना करनी चाहिए। शिवपुराण में वर्णित है, जिसमें शिवजी द्वारा चंद्रमा के प्राणों की रक्षा करने के लिए उन्हें अपनी जटाओं में विराजित किया गया है।
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जब शिवजी ने किया विषपान
शिवपुराण की कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन किया गया था तो उसमें से हलाहल विष भी निकला था। जिससे पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले उस विष का पान किया। मगर विष पीने के बाद उनका शरीर विष के प्रभाव से अत्यधिक गर्म होने लगा। यह देखकर सभी देवता व्याकुल हो गए। चंद्रमा ने उनसे प्रार्थना की वह उन्हें माथे पर धारण कर अपने शरीर को शीतलता प्रदान करें। ऐसे विष का प्रभाव भी कुछ कम हो जाएगा। इसके लिए पहले तो शिव नहीं मानें, क्योंकि चंद्रमा श्वेत और शीतल होने के कारण उस विष की तीव्रता सहन नहीं कर पाते। लेकिन अन्य देवताओं के निवेदन के बाद शिव इसके लिए मान गए और उन्होंने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। ऐसी लोकमान्यता है कि तभी से चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजित हैं और पूरी सृष्टि को अपनी शीतलता प्रदान कर रहे हैं।
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चंद्रमा की तपस्या से हुए शिव प्रसन्न
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रमा को पुनर्जीवित करने के लिए शिवजी ने अपने मस्तक पर उन्हें धारित किया। दरअसल चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 नक्षत्र कन्याओं के साथ संपन्न हुआ, जिसमें रोहिणी उनके सबसे समीप थीं। यह देख अन्य कन्याओं ने अपने पिता दक्ष से अपना दुख प्रकट किया। राजा दक्ष के समझाने पर भी जब चंद्रमा नहीं माने तब उन्होंने चंद्रदेव को श्राप दे दिया। जिसके बाद क्षय रोग से ग्रसित होने के कारण धीरे-धीरे चंद्रमा की कलाएं क्षीण होती गईं।
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तब इंद्र आदि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषि ब्रह्माजी की शरण में गए। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा से कहा- कि तुम देवताओं के साथ प्रभास नामक शुभ क्षेत्र में जाए और वहां मृत्युंजय मंत्र का विधि पूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान शिव की आराधना करें।अपने सामने शिवलिंग की स्थापना करके वहां चंद्रदेव नित्य तपस्या करें। तदन्तर चन्द्रमा ने भक्तिभाव से भगवान् शंकर की स्तुति की। भगवान् शकर ने चंद्रदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें साकार रूप में दर्शन दिए और प्रदोष काल में चंद्रमा को वरदान दिया कि चंद्रदेव!एक पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण होगी लेकिन दुसरे पक्ष में निरंतर बढ़ती रहे। जिससे चंद्रमा मृत्युतुल्य होते हुए भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए और फिर धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे और पूर्णमासी पर पूर्ण चंद्रमा के रूप में प्रकट हुए।इतना ही नहीं शिवजी ने प्रसन्न होकर चन्द्रमा को अपने शीश पर भी सुशोभित किया।