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महाशिवरात्रि विशेषः शिव कैसे बने रुद्र और नटराज

Mon, 07 Mar 2016 12:07 AM IST
राकेश झा/अमर उजाला, नई दिल्ली
राकेश झा/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 07 Mar 2016 12:07 AM IST
सार

  • श‌िव पुराण के अनुसार महादेव के जीवन की कई बड़ी घटनाएं इस रात को हुई हैं और इसका कारण यह है महादेव अपने हर काम को इस रात में करने का न‌िर्णय ल‌िया।
  • श‌िव पुराण, नारद पुराण सहित दूसरे अन्य पुराण कहते हैं कि अगर शिव और माता पार्वती इस स्वरूप को धारण नहीं करते तो सृष्टि आज भी विरान रहती।

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विस्तार

यूं तो हर द‌िन के बाद रात आती है और हर द‌िन चतुर्दशी त‌िथ‌ि आती है लेक‌िन फाल्गुन मास की कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी का व‌िशेष महत्व क्योंक‌ि यह रात आम रात नही बल्क‌ि महारात्र क्योंक‌ि यह देव के देव महादेव की रात है। महादेव की रात होने के कारण इसे महाश‌िवरात्र‌ि कहते हैं।

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श‌िव पुराण के अनुसार महादेव के जीवन की कई बड़ी घटनाएं इस रात को हुई हैं और इसका कारण यह है महादेव अपने हर काम को इस रात में करने का न‌िर्णय ल‌िया। इसी रात श‌िव पार्वती का व‌िवाह हुआ था। इसल‌िए इसे प्रकृत‌ि और पुरूष के म‌िलन की रात भी कहा जाता इसल‌िए इसे सृष्ट‌ि के आरंभ की रात भी कहा जाता है।
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कहते हैं क‌ि प्रलय काल में महादेव द‌िन और रात के संध‌ि काल में प्रदोष वेला में तांडव नृत्य करते हैं और पूरी सृष्ट‌ि लंबे समय तक तक के ल‌िए योगन‌‌िद्रा में सो जाती है। लेक‌िन भोलेनाथ का तांडव को एक मात्र रूप है इनके तो अनेक रूप हैं जो समय-समय पर लीलास्वरूप सृष्टि की रक्षा के ल‌िए इन्होंने धारण क‌िया है।

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श‌िव बने ऐसे रुद्र

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श‌िव बाल रूप

पुराणों में भगवान श‌िव को अजन्मा और अव‌िनाशी कहा गया है। इसल‌िए कहीं भी भगवान श‌िव के माता-प‌‌िता का ज‌िक्र नहीं म‌िलता है। लेक‌िन ऐसा नहीं संसार में जो भी आया है उसका कहीं न कहीं आद‌ि जरूर है।

व‌िष्‍णु पुराण में एक कथा है ज‌िससे ज्ञात होता है क‌ि सृष्ट के कर्ता ब्रह्मा जी ने श‌िव को उत्पन्न क‌िया। लेक‌िन ब्रह्मा ने ज‌िन श‌िव को उत्पन्न क‌िया वह श‌िव नहीं उनका एक स्वरूप है जो रुद्र कहलता है।

इस संदर्भ में कथा है क‌ि ओंमकार रूपरूप श‌िव ने ब्रह्मा जी से अपने ल‌िए शरीर रचना का आग्रह क‌िया तो ब्रह्मा जी ने एक सुंदर से बालक का न‌िर्माण क‌िया। जन्म लेते ही वह बालक रोना लगा और ब्रह्मा जी से अपना नाम पूछा तो ब्रह्मा जी ने परमेश्वर के उस स्वरूप को अपनी गोद में बैठा ल‌िया और कहा क‌ि जन्म लेते ही आपने रुदन क‌िया है इसल‌िए आप रूद्र कहलाएंगे। लेक‌िन बालक ने रोना बंद न‌हीं क‌िया और ब्रह्मा जी ने बालक को चुप करने के ल‌िए अन्य 7 नाम द‌िए शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव।

तब श‌िव बने नटराज

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श‌िव नटराज

भरत मुन‌ि के नाट्यशास्त्र के अनुसार भगवान श‌िव सृष्ट‌ि के प्रथम नर्तक हैं। त्र‌िपुर नाम के असुर का वध करने के बाद भगवान श‌िव बहुत प्रसन्‍न होते हैं और खुशी से नाचने लगते हैं। प्रारंभ में उन्हें इस बात का एहसास रहता है क‌ि वह अपनी पूरी भुजाएं खोलकर नृत्य करेंगे तो सृष्ट‌ि छ‌िन्न भ‌िन्न होने लगेगी इसल‌िए वह अपनी भुजाओं को संकुच‌ित करके नृत्य करते हैं लेक‌िन धीरे-धीरे नृत्य में ऐसे श‌िव मग्न होने लगते हैं क‌ि उन्हें क‌िसी बात का होश नहीं रहता है और सृष्ट‌ि का संतुलन ब‌िगड़ने लगता है।

सृष्ट‌ि की रक्षा के ल‌िए तब देवी पार्वती ने नृत्य करने लगती हैं जो 'लास्य' कहलता है यह प्रेम और आनंद का नृत्य है। देवी पार्वती के नृत्य से सृष्ट‌ि में संतुलन आता है और श‌िव शांत होते हैं। श‌िव के गण तंडु ने श‌िव के इस नृत्य को प्रचार‌ित क‌िया इसल‌िए यह तांडव नृत्य कहलाया। तांडव नृत्‍य नृत्य के 108 प्रकार बताए गए हैं जो अलग-अलग भाव ल‌िए होते हैं।

वीरभद्र बने भगवान श‌िव

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देवी सती प्रजापत‌ि दक्ष की पुत्री थी। आद‌िशक्त‌ि ने प्रजापत‌ि की तपस्या से पसन्न होकर वरदान द‌िया था क‌ि मैं तुम्हारे घर पुत्री रूप में जन्म लूंगी और महादेव की पत्नी बनूंगी। लेक‌िन प्रजापत‌ि को यह पसंद नहीं था क‌ि सती भगवान श‌िव से व‌िवाह करे इसके बावजूद सती ने भगवान श‌िव से व‌िवाह कर ल‌िया।

प्रजापत‌ि इससे बहुत नाराज हुए और जब उन्होंने महायज्ञ का आयोजन क‌िया तब सभी देवों को उनमें आमंत्र‌ित क‌िया लेक‌िन महादेव को न्यौता नहीं भेजा। देवी सती को यह बात बुरी लगी और वह अपने महादेव से ज‌िद्द करके अकेले ही महायज्ञ में शाम‌िल होने के ल‌िए प‌िता दक्ष के घर पहुंच गई। दक्ष प्रजापत‌ि ने भरी सभा में सती और महादेव का अपमान क‌िया। इससे दुखी होकर देवी सती ने हवन कुंड में आत्मदाह कर ल‌िया।

नाराज होरक भगवान श‌िव ने सृष्ट का व‌िनाश करने के ल‌िए भयानक नृत्य करना शुरू कर द‌िया। श‌िव का यह नृत्य तांडव कहलाया। इसी समय भगवान श‌िव ने अपनी जटा से एक लट तोड़कर भूम‌ि पर पटका ज‌िससे व‌िनाशकारी व‌ीरभद्र का जन्म हुआ।

तब धारण करना पड़ा श‌िव को अर्धनारीश्वर स्वरूप

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अर्द्धनारीश्वर श‌िव

श‌िव पुराण, नारद पुराण सहित दूसरे अन्य पुराण कहते हैं कि अगर शिव और माता पार्वती इस स्वरूप को धारण नहीं करते तो सृष्टि आज भी विरान रहती। अर्धनारीश्वर स्वरूप के विषय में जो कथा पुराणों में दी गयी है उसके अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना का कार्य समाप्त किया तब उन्होंने देखा कि जैसी सृष्टि उन्होंने बनायी उसमें विकास की गति नहीं है।

जितने पशु-पक्षी, मनुष्य और कीट-पतंग की रचना उन्होंने की है उनकी संख्या में वृद्ध‌ि नहीं हो रही है। इसे देखकर ब्रह्मा जी चिंतित हुए। अपनी चिंता लिये ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु जी ने ब्रह्मा से कहा कि आप शिव जी की आराधना करें वही कोई उपाय बताएंगे और आपकी चिंता का निदान करेंगे।

ब्रह्मा जी ने शिव जी की तपस्या शुरू की इससे शिव जी प्रकट हुए और मैथुनी सृष्टि की रचना का आदेश दिया। ब्रह्मा जी ने शिव जी से पूछा कि मैथुन सृष्टि कैसी होगी, कृपया यह भी बताएं। ब्रह्मा जी को मैथुनी सृष्टि का रहस्य समझाने के लिए शिव जी ने अपने शरीर के आधे भाग को नारी रूप में प्रकट कर दिया।

इसके बाद नर और नारी भाग अलग हो गये। ब्रह्मा जी नारी को प्रकट करने में असमर्थ थे इसलिए ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर शिवा यानी शिव के नारी स्वरूप ने अपने रूप से एक अन्य नारी की रचना की और ब्रह्मा जी को सौंप दिया। इसके बाद अर्धनारीश्वर स्वरूप एक होकर पुनः पूर्ण शिव के रूप में प्रकट हो गया। इसके बाद मैथुनी सृष्टि से संसार का विकास तेजी से होने लगा। शिव के नारी स्वरूप ने कालांतर में हिमालय की पुत्री पार्वती रूप में जन्म लेकर शिव से मिलन किया।

इस रूप में भगवान नरस‌िंह का क्रोध क‌‌िया शांत

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शारभ नृस‌िंह भगवान

ह‌िरण्यकश्यप का वध करने के ल‌िए जब भगवान व‌िष्‍णु ने नृस‌िंह अवतार ल‌िया तब इतने क्रोध में थे क‌ि पूरी सृष्ट‌ि में तबाही मचाने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श‌िव ने अपने स्वरूप से उत्पन्न वीरभद्र से कहा क‌ि नृस‌िंह भगवान के क्रोध को शांत करें। अगर वह बल प्रयोग करें तो बल से उन पर काबू पाना।

श‌िव के आदेश से वीरभद्र नृसिंह भगवान के पास पहुंचे और पहले विनित भाव से शांत करने की कोशिश करने लगे। लेकिन जब नृसिंह नहीं माने तब वीरभद्र ने शरभ पक्षी का रूप धारण लिया। शरभ उपनिषद् में उल्लेख है कि नृसिंह को वश में करने के लिए वीरभद्र गरूड़, सिंह और मनुष्य का मिश्रित रूप धारण करके प्रकट हुए और शरभ कहलाये।

शरभ ने नृसिंह को अपने पंजे से उठा लिया और चोंच से वार करने लगा। शरभ के वार से आहत होकर नृसिंह ने अपना शरीर त्यागने का निर्णय लिया और शिव से निवेदन किया कि इनके चर्म को शिव अपने आसन के रूप में स्वीकार करें। इसके बाद नृसिंह भगवान विष्णु के तेज में मिल गये और शिव ने इनके चर्म को अपना आसन बना लिया।

श‌िव ने ल‌िया हनुमान रूप

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भगवन श‌िव का एक रूवरूप हनुमान जी का भी है। रामचर‌ित मानस से लेकर बाल्म‌िकी रामायण तक सभी में इस बात का ज‌िक्र क‌िया गया है क‌ि भगवान श्री राम के काम को सफल बनाने के ल‌िए श‌िव जी ने केसरीनदंन हनुमान जी का अवतार ल‌िया। अवतारों की बात करें तो श‌िव के 19 अवतार माने जाते हैं। इनमें एक हनुमान जी भी हैं।

हनुमान जी ने ही रावण की लंका का दहन क‌िया क‌िया था। श‌िव के अवतार होने के कारण सूर्य को मुंह में रख ल‌िया था। एक छलांग में सागर को पार करने वाले भी हनुमान जी थे। हनुमान जी के बारे में कहा जाता है क‌ि यह आज भी उस स्वरूप में पृथ्वी पर न‌िवास करते हैं ज‌िस रूप में श्री राम की सेवा के ल‌िए इन्होंने अवतार ल‌िया था।
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