श्रीकृष्ण के परिवार से था एक तीर्थंकर का संबंध, रिश्ते में थे श्रीकृष्ण के चचेरे भाई
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जैन पंरपरा के पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ के बाद अंतिम चार तीर्थंकरों के बारे में ही बहुत कुछ पढ़ने को मिलता है। उन के बीच के उन्नीस तीर्थंकरों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी ही मिलती है। ऋषभनाथ के बाद जिनके बारे में कुछ विस्तार से जानकारी मिलती है, वे पार्श्वनाथ ही हैं। पार्श्वनाथ और ऋषभनाथ के अलावा जिनके बारे में सूचना संदर्भ मिलते हैं, वे उनके वंश परिचय, और प्रतीक चिह्न, चैत्यवृक्ष, यक्ष और यक्षिणी के संकेत ही हैं। तपस्या, कैवल्य ज्ञान और देवलोक से आने वाले प्रलोभन ही इन प्रतीकों में है। उन प्रतीकों के अर्थ समझकर, प्रेरणाओं को ग्रहण कर ही कैवल्य की ओर बढ़ा जा सकता है। पार्श्वनाथ के बारे में कहा जाता है कि उनके पूर्ववर्ती तीर्थंकर नेमिनाथ का संबंध श्रीकृष्ण से था। वे रिश्ते में श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। गिरनार पर्वत पर उन्हें कैवल्य प्राप्त हुआ था। जैन तीर्थंकरों ने धर्म परंपरा में जो प्रचलन जोड़े, उनमें दो मुख्य हैं। एक तो यह कि जैन धर्म तप अर्थात अपने परिष्कार पर जोर देता है।
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तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का संदेश था कि धर्म इसी जन्म में और अभी ही सुख शांति नहीं देता है, तो पारलौकिक शांति की कल्पना व्यर्थ है। उन्होंने अपने स्वभाव को, अपने आप को सिद्ध करने वाले जीवंत धर्म का संदेश दिया। जैन पुराणों के अनुसार, तीर्थंकर बनने के लिए पार्श्वनाथ को नौ जन्म लेने पड़े। इतने जन्मों के संचित पुण्यों के बाद दसवें जन्म में वे तेईसवें तीर्थंकर बने। तीर्थंकर का अर्थ है, 'घाट की तरह भव सागर पार करने की क्षमता रखने वाला प्रस्थानबिंदु'। इस पंरपरा में पार्श्वनाथ या महावीर के अनुयायी मानते हैं कि जिन-शासन के अतिरिक्त सभी शासन मिथ्या हैं, इसलिए दूसरे शासन में नहीं जाना चाहिए। यह भाव सिर्फ निष्ठा और विश्वास बनाए रखने के लिए है, अन्यथा जाग्रत व सिद्धपुरुष हमेशा और हर स्थान पर उपलब्ध हैं।
पार्श्वनाथ महावीर से कोई ढ़ाई सौ साल पहले हुए की परंपरा थी। महावीर के समय में श्वेतांबर पंरपरा का जन्म हुआ। पार्श्वनाथ को मानने वाले लोग श्वेतांबर थे। वे अब भी पार्श्वनाथ को वरिष्ठ मानते हैं और महावीर को इनकार करते हैं। ढाई हजार साल हो गए, लेकिन श्वेतांबर की जो मान्यता है, वह अभी भी पार्श्वनाथ से प्रभावित है। अतीत तो जा चुका। खोजना तो आज होगा, इसलिए दुविधा होती है। जो आदमी परंपरा को मानता है, वह जिन-शासन को नहीं मान सकता, क्योंकि जिन का अर्थ है, जागा हुआ, जीवंत व्यक्ति। परंपरा को मानने वाला, परंपरा को मानने के कारण ही वर्तमान के जाग्रत पुरुषों से वंचित रह जाता है। जाग्रत पुरुष जब मौजूद होता है, तो सिद्धजनों के अनुसार बड़ी कठिनाई होती है। कठिनाई यह कि अगर उसे मानें, तो बदलना पड़े। अपना सारा जीवन रूपांतरित करना पड़े। जाग्रत व्यक्ति को, सिद्ध पुरुष को नहीं बदल सकते। उसके पास जाने वाले को वही बदलना पड़ेगा। पार्श्वनाथ अनेकांत दर्शन के प्रवर्तक थे। सत्य एकांत नहीं है, जो कहता है कि यही सत्य है, वह यह कहते ही असत्य हो जाता है। अनेकांत दर्शन पार्श्वनाथ की अनूठी देन है।
पार्श्वनाथ का बचपन राजसी वैभव और ठाट-बाठ में बीता था। जब सोलह वर्ष के थे, तो वन भ्रमण करते हुए उनकी दृष्टि एक तापस पर पड़ी। तापस कुल्हाड़ी से एक वृक्ष पर प्रहार कर रहा था। यह दृश्य देखकर पार्श्वनाथ चीख उठे और बोले जीवों को मत मारो। उस तापस का नाम महीपाल था। वह पार्श्वनाथ की ओर पलटा और बोला,'मैं कहां किसे मार रहा हूं? मैं तो तप के लिए लकड़ी काट रहा हूं।' पार्श्वनाथ ने कहा, लेकिन उस वृक्ष पर नाग-नागिन का जोड़ा है। महीपाल ने तिरस्कारपूर्ण स्वर में कहा, 'तू क्या त्रिकालदर्शी है?' और पुन: वृक्ष पर वार करने लगा। तभी वृक्ष के चिर तने से छटपटाता, रक्त से नहाया हुआ नाग-नागिन का जोड़ा बाहर निकला। पार्श्वनाथ ने अहिंसा का दर्शन दिया। प्राचीन उद्घोष एक बार फिर से करते हुए उन्होंने संदेश दिया- ‘सव्वे पाणा पियाउवा, सव्वे दुक्ख पडिकुला’- यानी सबको जीवन प्रिय है, दुख को कोई नहीं चाहता। पार्श्वनाथ ने लगभग सत्तर वर्ष तक लोगों को अपनी उपस्थिति का आलोक बांटा। फिर सौ वर्ष की उम्र में सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त किया।
पार्श्वानाथ को इस घटना से संसार के जीवन मृत्यु से विरक्ति हो गई। जब वह 30 वर्ष के हुए, तो उनके जन्मदिवस पर अनेक राजाओं ने उपहार भेजे। अयोध्या का दूत उपहार देने लगा, तो पार्श्वनाथ ने उससे अयोध्या के वैभव के बारे में पूछा। उसने कहा “जिस नगरी में ऋषभदेव, आजितनाथ, सुमितनाथ और अनंतनाथ जैसे पांच तीर्थंकरों ने जन्म लिया, तो उसकी महिमा के क्या कहने। वहां तो वैभव और पुण्य बिखरा पड़ा है।” सुनते ही पार्श्वनाथ को अपने पिछले जन्मों का बोध हुआ। उन्होंने उसी समय मुनि दीक्षा ली और विभिन्न वनों में तप करने लगे। चैत्र कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ और वे तीर्थंकर बन गए। वह सौ वर्ष तक जीवित रहे। तीर्थंकर बनने के बाद का उनका जीवन जैन धर्म के प्रचार- प्रसार में गुजरा और फिर श्रवण शुक्ल सप्तमी के दिन, उन्हें सम्मेद शिखरजी पर निर्वाण हुआ।