कुंभ स्नान और तीर्थ स्थान से जुड़ी यह बातें नहीं जानते होंगे
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ज्योतिष की दृष्टि से कुंभ एक योग है। सूर्य चंद्रमा और बृहस्पति के एक राशि में आने से कुंभ योग बनता है। शास्त्रों की बात करें तो ग्रंथो में यह स्पष्ट उल्लेख है कि वैदिक युग में देश में 12 स्थानों पर कुंभ पर्व का आयोजन होता था।
रूद्रयामल तंत्र, विष्णु पुराण, स्कंध पुराण आदि ग्रंथों में समुद्र मंथन और द्वादश कुंभ स्थलियों का वर्णन है।
यहां भी होंगे अब कुंभ स्नान
भारतीय संस्कृति पर हुए अनेकानेक आक्रमणों के कारण यह परंपरा लुप्त हो गई। बाद में 645 ई. में राजा हर्षवर्धन के समय नासिक, उज्जैन, हरिद्वार और प्रयाग में इसका पुनर्जागरण हुआ। लेकिन सिमरिया धाम, बद्रीनाथ, गुवाहाटी, कुरूक्षेत्र, गंगासागर, जगन्नाथ, कुंभकोणम रामेश्वरम में यह परंपरा लुप्त रही।
हजारों वर्षों बाद बिहार के सिमरिया घाट स्थित सिद्धाश्रम के संत करपात्री अग्निहोत्री स्वामी चिदात्मन जी महाराज ने सुप्त कुंभ स्थलियों के पुनर्जागरण का संकल्प लिया। उनके इस ऐतिहासिक संकल्प और प्रस्ताव का काशी हिंदू विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के विद्वत परिषद ने सहर्ष अनुमोदन किया।
यहां हुआ था अमृत का वितरण
संत समाज, इतिहासविदों, ज्योतिषविदों, विद्वतजनों ने भी इस अभियान की खूब सराहना की। इसी क्रम में मिथिलांचल को समुद्र मंथन स्थली के रूप में मान्यता मिली और सामृता यानी सिमरिया में अमृत वितरण का उल्लेख सामने आया। सन 2011 में सिमरिया अर्ध कुंभ के पुनर्जागरण के साथ यह अभियान प्रारंभ हुआ।
अगले वर्ष बद्रीकाश्रम और फिर जग्गनाथपुरी कुंभ का पुनर्जागरण किया गया। इसी तरह इस वर्ष 26 जुलाई को सप्तपुरियों में से एक भगवान कृष्ण की ऐतिहासिक नगरी द्वारिका में कुंभ के पुनर्जागरण के साथ ही एक नया अध्याय जुड़ गया।
बिहार के बेगुसराय स्थित सिमरियाधाम से शुरू हुआ द्वादश कुंभ स्थलियों के पुनर्जागरण का पावन अभियान द्वारिका पहुंचा तो कृष्ण भक्तों ने इसका खुले दिल से स्वागत किया। समुद्र किनारे स्थित उड़िया बाबा आश्रम से कुंभ की शोभायात्रा निकाली गई।