{"_id":"6487ed73e36291c1cc0e9b74","slug":"jagannath-yatra-2023-jagannath-mandir-katha-know-mysterious-facts-related-to-jagannath-2023-06-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"Jagannath Yatra 2023: जानिए कैसे शुरू हुई जगन्नाथ पुरी में रथ यात्रा की शुरुआत, कैसे होते हैं भगवान के रथ?","category":{"title":"Religion","title_hn":"धर्म","slug":"religion"}}
Jagannath Yatra 2023: जानिए कैसे शुरू हुई जगन्नाथ पुरी में रथ यात्रा की शुरुआत, कैसे होते हैं भगवान के रथ?
Tue, 20 Jun 2023 06:36 AM IST
विनोद शुक्ला
अनीता जैन ,वास्तुविद
अनीता जैन ,वास्तुविद
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 20 Jun 2023 06:36 AM IST
सार
जगन्नाथजी की रथ यात्रा के बारे में स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया गया है। इसलिए हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व बताया गया है। इस बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का उत्सव 20 जून से शुरू हो रहा है।
विज्ञापन
Jagannath Rath Yatra 2023
- फोटो : iStock
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हर साल अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथजी की पुरी में रथ यात्रा निकाली जाती है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ भी निकाला जाता है। जगन्नाथजी की रथ यात्रा के बारे में स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया गया है। इसलिए हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व बताया गया है। इस बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का उत्सव 20 जून से शुरू हो रहा है। आइए जानते हैं इस यात्रा से जुड़ी कई रोचक बातें...
विज्ञापन
ऐसे हुई रथ यात्रा शुरू
इस रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी। तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन की इच्छा पूर्ति के लिए उन्हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था और इसके बाद से इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति इस रथ यात्रा में शामिल होकर इस रथ को खींचता है उसे सौ यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
विज्ञापन
Jagannath Temple: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में आज भी की जाती है अधूरी मूर्ति की पूजा, जानिए इसके पीछे का रहस्य
विज्ञापन
कैसे होते हैं भगवान के रथ
800 साल पुराने इस मंदिर में भगवान कृष्ण को जगत के नाथ जगन्नाथजी के रूप में पूजा जाता है और इनके साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी विराजमान हैं। रथयात्रा में तीनों ही देवों के रथ निकलते हैं। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के साथ भाई बलराम और बहन सुभद्रा के लिए अलग-अलग रथ होते हैं और इन रथों को बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया से होती है। रथयात्रा में सबसे आगे बलराम और बीच में बहन सुभद्रा का रथ रहता है। सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। सभी के रथ अलग-अलग रंग और ऊंचाई के होते हैं। भगवान बलरामजी के रथ को 'तालध्वज' कहा जाता है और इसकी पहचान लाल और हरे रंग से होती है। वहीं सुभद्रा के रथ का नाम 'दर्पदलन' अथवा ‘पद्म रथ’ है, उनके रथ का रंग काला या नीले रंग को होता है, जिसमें लाल रंग भी होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष अथवा गरुड़ध्वज कहा जाता है, इनका रथ लाल और पीले रंग का होता है। रथ हमेशा नीम की लकड़ी से बनाया जाता है, क्योंकि ये औषधीय लकड़ी होने के साथ पवित्र भी मानी जाती है।हर साल बनने वाले ये रथ एक समान ऊंचाई के ही बनाए जाते हैं। इसमें भगवान जगन्नाथ का रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलराम का रथ 45 फीट और देवी सुभद्रा का रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है। भगवान के रथ में एक भी कील या कांटे आदि का प्रयोग नहीं होता। यहां तक की कोई धातु भी रथ में नहीं लगाई जाती है। रथ की लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन और रथ बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से होती है।
सोने की झाड़ू से होता है रास्ता साफ
तीनों रथ के तैयार होने के बाद इसकी पूजा के लिए पुरी के गजपति राजा की पालकी आती है। इस पूजा अनुष्ठान को 'छर पहनरा' नाम से जाना जाता है। इन तीनों रथों की वे विधिवत पूजा करते हैं और ‘सोने की झाड़ू’ से रथ मण्डप और यात्रा वाले रास्ते को साफ किया जाता हैं।