गुरु नानक जयंती 2017: गुरु नानक देव ने दिखाई जीवन की सच्ची राह
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सिख धर्म, बाकी सब धर्मों से छोटी उम्र का होने के कारण आधुनिकता के ज्यादा नजदीक है। इस धर्म को वैज्ञानिक धर्म भी कहा जाता है। इसके बानी श्री गुरु नानक देव जी ने संगतों को विशेष तौर पर वैज्ञानिक विचारधारा प्रदान की है। सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी ने गांव तलवंडी में बाबा कल्याणचंद्र उर्फ महिता कालू पटवारी तथा माता तृप्ता के घर में अवतार लिया। जिस काल में गुरु नानक देव जी ने अवतार लिया, वह समय दुनिया में धर्म, कला, साहित्य, तथा ज्ञान के दोबारा स्थापित होने का समय था।
गुरु नानक देव जी को सात साल की आयु में गोपाल पंडित से हिंदी तथा नौ साल की आयु में पंडित ब्रिजलाल से संस्कृत पढ़ने के लिए भेजा। 13 साल की उम्र में गुरु जी फारसी की तालीम लेने मौलवी कुतुबुद्दीन के पास गए। गुरु नानक देव जी ने यहां उस्तादों से संसारी शिक्षा गृहण की, वहीं उन उस्तादों को सच्ची शिक्षा (रब्बी ज्ञान) का पाठ भी पढ़ाया।
गुरु नानक देव जी को शुद्रों से अलग करने के लिए पुरोहितों ने जनेऊ पहनाने की बहुत कोशिश की। इस अवसर पर गुरु जी की ओर शब्दों का उच्चारण किया गया। 'दया कपाह सतोख सूत जतु सतु वटु। ऐहु जनेऊ जीअ का हई त पांढ धतु।' 16 वर्ष की आयु में गुरु नानकदेव जी का आनंद कारज, बटाला, गुरदासपुर जिले कि सुलक्खनी के साथ हुआ। 25 वर्ष की आयु में गुरु नानक देव जी के घर बाबा श्रीचंद एवं 28 की आयु में बाबा लखमी दास जी पैदा हुए।
गांव तलवंड़ी के निवासी भाई मरदाना जी, जो मुसलमान मिरासी थे, गुरु साहिब के बहुत अच्छे मित्र थे। बतौर रबाबी वह गुरु साहिब जी के साथ छह दशक तक रहे। कुछ समय बाद गुरु नानक देव जी अपनी बहन के घर सुल्तानपुर लोधी पहुंचे। यहां गुरुजी, नवाब दौलत खां लोधी के मोदी बन गए। यहां वह मोदीखाने में राशन लेने आए लोगों को राशन तोलकर देते थे। इस तोल तुलाई से ही 'तेरा तेरा' का उपदेश्ा जुड़ा हुआ है। कारोबार से मुक्त होकर गुरुजी, नगर में सत्संग कराया करते थे।
इस सत्संग की बदौलत सिख धर्म को मानने वाले लोगों में बढ़ोतरी होने लगी। यहीं गुरु नानक देव जी ने एकांतवास किया। इस एकांतवास के बाद उन्होंने भटकी हुई लोकाई को एक नवीन नारा, 'न हिंदू न मुसलमान।' दिया। मनुष्यता को उबारने वाले इस नारे की खूब चर्चा हुई। अपनी इस क्रांतिकारी सोच के कारण गुरुजी ने देश-विदेश के कई दौरे भी किए, जिन्हें सिख इतिहास में उदासियों के नाम से जाना जाता है।
गुरु नानक देव जी के अवतार धारण से पहले भारत में वैदिक धर्म का बोलबाला था। भारतीय समाज उलझन से भरपूर, जातियों तथा धार्मिक सम्प्रदायों में बंटा हुआ था। लोगों में आपसी भाईचारे एवं एकसुरता की भावना पूरी तरह आलोप हो चुकी थी। इसमें तब्दीली लाने के लिए गुरु नानक देव जी, भाई मरदाना जी को साथ लेकर देश-विदेशों में गए।
इस सफर में गुरु साहिब का लगभग 25 वर्ष का समय लगा। 1522 में गुरु नानकदेव जी ने करतारपुर साहिब नगर बसाया। यहीं लहना जी गुरु नानकदेव की सेवा में हाजिर हुए और सात साल की समर्पित सेवा के बाद, गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी के रूप में गद्दी पर शोभायामान हुए। बाद में वह गुरु अगंददेव के नाम से जाने गए। धर्म प्रचार करते हुए गुरु नानक देव जी, श्री करतारपुर साहिब में 22 सितंबर 1539 को ज्योति-जोत में समा गए।
अमर उजाला खुला पन्ना से साभार