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साल की पहली एकादशी है खास, आप भी करना चाहेंगे यह व्रत

Sat, 11 Jan 2014 08:58 AM IST
टीम डिजीटल
टीम डिजीटल Updated Sat, 11 Jan 2014 08:58 AM IST
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ekadashi purtada vart katha puran

शास्त्रों में पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी बताया गया है। यह एकादशी व्रत इस वर्ष 11 जनवरी को शनिवार के दिन है। अपने नाम के अनुसार ही यह एकादशी व्रत पुत्र सुख प्रदान करने वाली मानी जाती है। पद्म पुराण में इस एकादशी के महात्म्य का विस्तार से वर्णन किया गया है।

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पुत्रदा एकादशी व्रत विधि
भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा का वर्णन करते हुए बताया है कि इस व्रत के देवता श्री नारायण हैं। जो व्यक्ति संतान सुख की इच्छा रखता है उसे पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत रखना चाहिए। व्रत रखने वाले को दशमी के दिन लहसुन, प्याज से रहित शुद्घ भोजन करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत होकर श्री नारायण की भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए और दीपदान करना चाहिए।
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व्रत रखने वाले को दशमी के दिन से ही मन और वचन से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भगवान का ध्यान करते हुए अपना काम करना चाहिए। जो व्यक्ति यह व्रत रखता है उसे एकादशी के दिन पूरे दिन निराहार रहना होता है। शाम को चाहें तो फलाहार कर सकते हैं।
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द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन करवाकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। द्वादशी के दिन भी सात्विक भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार नियमपूर्वक जो लोग पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं उनका व्रत ही सफल होता है।

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। विवाह के काफी समय बाद भी पति-पत्नी संतान सुख से वंचित थे। एक दिन दुःखी होकर राजा सुकेतुमान किसी से कुछ बताये बिना वन चले गये। वन में इन्हें एक सुन्दर सरोवार के पास कुछ मुनि दिखाई पड़े। राजा मुनियों के पास पहुंचे और उन्हें प्रणाम किया। मुनियों ने बताया कि वह विश्वदेव हैं।

राजा ने विश्वदेव से संतानहीनता का दुःख बताया और इसका उपचार पूछा। मुनियों ने राजा से कहा कि आपने बड़े ही शुभ दिन पर यह प्रश्न किया है, आज पौष शुक्ल एकादशी तिथि है। इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। इस व्रत के पुण्य से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।


इसके बाद मुनियों द्वारा बताये गये विधि से राजा ने पुत्रदा एकादशी व्रत रखा। इसके पुण्य से कुछ समय बाद रानी चम्पा गर्भवती हुई और एक नियत समय पर सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। बड़ा होकर राजा का यह पुत्र धर्मात्मा और प्रजापालक हुआ।

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