मां दुर्गा की महाआरती से पहले क्यों पढ़ते हैं ‘न मंत्रं नो यंत्रं’ स्तुति? जानें धार्मिक मान्यता
Durga Puja 2026: मां दुर्गा की पूजा और आरती के दौरान मंत्रों व स्तोत्रों का पाठ विशेष महत्व रखता है। इन्हीं में ‘न मंत्रं नो यंत्रं’ स्तुति भी शामिल है, जिसे देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसका पाठ करके भक्त मां भगवती से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगते हैं। जानें इस स्तुति का महत्व और इसे पढ़ने से जुड़ी मान्यताएं।
विस्तार
दुर्गाष्टमी के पावन अवसर पर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और आरती का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से माता रानी की पूजा करने से भक्तों को सुख-समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद मिलता है। पूजा के दौरान देवी के मंत्रों और स्तोत्रों का पाठ भी किया जाता है। इन्हीं में एक है ‘न मंत्रं नो यंत्रं’ स्तुति, जिसे देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस स्तोत्र का पाठ करके भक्त मां भगवती से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगते हैं। आइए जानते हैं इस स्तुति का महत्व और इसका पाठ क्यों किया जाता है।
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
न मत्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो, न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं, परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ।।१।।
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया, विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे, कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।२।।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः, परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे, कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।३।।
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता, न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे, कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।४।।
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया, मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता, निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ।।५।।
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा, निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं, जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ।।६।।
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो, जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं, भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ।।७।।
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे, न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै, मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ।।८।।
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः, किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे, धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ।।९।।
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं, करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः, क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ।।१०।।
जगदम्ब विचित्रमत्र किं, परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं, न हि माता समुपेक्षते सुतम् ।।११।।
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि, एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ।।१२।।
विजयादशमी 2026: दशहरे पर क्या होती है दशहरी देने की परंपरा? जानिए इसका महत्व
मंगल गोचर 2026: अश्लेषा नक्षत्र में प्रवेश से 4 राशियों की चमकेगी किस्मत, धन लाभ और करियर में तरक्की के योग
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।