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बराबफात विशेषः ऐसे मुहम्मद साहब ने इस्लाम का परचम बुलंद किया
जैनब नकवी
Updated Tue, 14 Jan 2014 12:11 PM IST
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रबीउल-अव्वल इस्लामी महीनों में तीसरा महीना है। इस मुबारक महीने में हजरत मोहम्मद का जन्म हुआ। उस समय खुदा का नाम लेने वाला कोई नहीं था। लोग आपस में लड़ते झगड़ते थे। जुल्म भी बढ़ रहे थे। ऐसे समय दुनिया को ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो इंसानियत का पैगाम पूरी दुनिया में फैलाए।
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लोगों को आपस में जोड़े। जो बेसहारा लोगों का सहारा बन सकें। आखिर खुदा ने लोगों की मदद के लिए हजरत मोहम्मद को दुनिया में भेजा। उन्होंने इंसानियत का रास्ता दिखाया। फिर हर जगह रोशनी हो गई।
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शुरू में दुनिया को खुदा के रास्ते में लाने पर उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा। आखिर उनके इरादों की जीत हुई। फिर तो मस्जिद ने कहा उसे रोशन मिनार मिल गया, आलिमों ने कहा उन्हें इल्म का खजाना मिल गया।
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फिर तो इस्लाम का परचम बुलंद हो गया। इस्लाम का कलमा पढ़ा जाने लगा। उन्होंने अगर लोगों को नमाज पढ़ने का हुक्म दिया तो पहले रात रात भर नमाज पढ़ कर दिखाई। रोजा रखने को कहा तो पहले खुद रोजा रखा। कोई बीमार होता तो वह उसे देखने जाते,उसके लिए खुदा से दुआ करते।
पैगंबर ने हमेशा सच बोला। मोहम्मद यानी जिसकी प्रशंसा की गई हो। उनकी शिक्षा यही थी कि क्रोध पर काबू रखो। 622 ई. में उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ मक्का से मदीना कूच किया। मदीना में उनका स्वागत हुआ। देखते-देखते बुराईयां समाप्त हो गईं। एक बेहतरीन तहजीब वाला समाज बन गया।