इन मंदिरों में देवताओं की नहीं असुरों की होती है पूजा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यूं तो दुर्योधन को महाभारत का खलनायक कहा जाता है लेकिन उत्तराखंड के नेटवार के एक मंदिर में दुर्योधन को देवता की तरह पूजा जाता है और यहां दुर्योधन की पूजा करने दूर दूर से लोग आते हैं।
दुर्योधन का मंदिर नेटवाड नामक स्थान से करीब 12 किमी की दूरी पर हर की दून रोड पर स्थित एक गांव में है। उस गांव का नाम सौर है। यहां से कुछ किलोमीटर दूर सारनोल गांव में दुर्योधन के प्रिय मित्र कर्ण का मंदिर भी बना हुआ है।
रावण का मंदिर, साल में एक दिन खुलता है दरवाजा
उत्तरप्रदेश के कानपुर शहर के शिवाला इलाके में दशानन मंदिर है जहां लंकाधिपति रावण की पूजा होती है। यहां रावण को शक्ति का प्रतीक और प्रकांड पंडित मानने वाले श्रध्दालु अपने लिए मन्नतें मांगते हैं। मंदिर का निर्माण वर्ष 1890 में हुआ था।
ये मंदिर साल में केवल एक दिन खुलता है। दशहरे के दिन सुबह नौ बजे मंदिर के कपाट खुलते हैं और दशानन की मूर्ति को नहला धुला कर उसका श्रंगार किया जाता है। दोपहर को दशानन की आरती और पूजा अर्चना की जाती है। शाम को रावण दहन के बाद मंदिर के कपाट साल बंद कर दिए जाते हैं औऱ फिर अगले दशहरे को खुलते हैं।
नोएडा के बिसरख और इंदौर में भी रावण के मंदिर हैं। दक्षिण भारत में भी रावण के कुछ मंदिर हैं जहां दशानन की पूजा होती है।
कृष्ण की दुश्मन, देवी बन लेटी है इस मंदिर में
मथुरा और वृंदावन घूमने जाएं तो गोकुल भी जरूर जाइएगा। गोकुल में भगवान कृष्ण को दूध पिलाने बहाने मारने का प्रयास करने वाली पूतना का भी मंदिर है। यहां पूतना की लेटी हुई मूर्ति है और उसकी छाती पर चढ़कर उसका दूध पीते भगवान कृष्ण भी हैं।
लोगों का मानना है कि भले ही पूतना कंस के कहने पर कृष्ण को मारने आई थी लेकिन उसने एक मां का रूप धरा और भगवान ने उसका दूध पिया इसलिए उसे जननी समान देखा जाता है और उसकी पूजा की जाती है।
जिसे विष्णु ने भेजा पाताल, उसी की पूजा से हो रहे निहाल
राजा बली जिन्होंने एक समय में सभी देवताओं को बंदी बनाकर कारावास में डाल दिया था, उन देवताओं को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और तीन पैरों में ही तीन लोक नाप लिए थे। भगवान की इस चालाकी से सभी देवता बली की कैद से मुक्त हुए।
इन्हीं राजा बलि को केरल में मावेली यानी महाबली कहा जाता है। पूरे केरल में मावेली मंदिर हैं जहां राजा बलि की पूजा होती है। यहां का सरगरा समाज बलि को देवता तुल्य मानते हुए उनकी पूजा करता है। इस समुदाय का कहना है कि राजा बलि अपनी प्रजा के लिए दुनिया के सबसे बेहतरीन राजा थे और अपनी प्रजा की भलाई के लिए ही वो पाताल चले गए।
कृष्ण के कंस मामा भी यहां भगवान बन बैठे हैं
मथुरा के राजा और भगवान कृष्ण के क्रूर मामा कंस का मंदिर भी है। लखनऊ से हरदोई की ओर जाते हुए एक गांव में कंस की बड़ी सी मूर्ति है और यहां बाकायदा पूजा अर्चना की जाती है।
हालांकि अधिकतर श्रद्धालुओं को नहीं पता कि वो एक दुराचारी शासक की पूजा क्यों करते हैं लेकिन उनका कहना है कि उनकी पुरानी पीढ़ियां ये पूजा करती आ रही है और वो भी उस परंपरा का पालन करते हैं।
दूसरी तरफ कुछ गांववालों का कहना है कि कंस का कसूर इतना था कि वो नियति को बदलना चाहता था। अपने भांजे के हाथों मारे जाने की भविष्यवाणी से पहले कंस बहुत ही नेक और बेहतरीन राजा था और वो अपनी बहन देवकी से भी बहुत प्यार करता था।
यहां अहिरावण और महिरावण भी पूजे जाते हैं
राम रावण युद्ध के दौरान रावण का भाई अहिरावण राम और लक्ष्मण को नींद में ही हरण करके पाताल में ले गया था और उनकी बलि देना चाहता था। बाद में हनुमान जी ने अहिरावण का वध कर राम और लक्ष्मण को मुक्त कराया।
झांसी के पचकुइंया में हनुमान जी के मंदिर में अहिरावण की भी पूजा की जाती है। लगभग 300 साल पुराने इस मंदिर में हनुमान जी की विशाल मूर्ति के साथ साथ अहिरावण और उसके भाई महिरावण की भी प्रतिमा की पूजा की जाती है।
लोगों का मानना है कि अहिरावण रावण के कहने पर ही राम और लक्ष्मण को ले गया था, लेकिन वो पाताल लोक का सर्वप्रिय राजा था। इन मूर्तियों के बगल में हनुमान जी के कथित पुत्र मकरध्वज जो अहिरावण के राज में पहरेदार थे, उनकी भी पूजा की जाती है।