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आमलकी एकादशी, आंवले से करें मोक्ष प्राप्ति के उपाय

Fri, 22 Mar 2013 03:56 PM IST
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
राकेश/इंटरनेट डेस्क। Updated Fri, 22 Mar 2013 03:56 PM IST
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amlaki ekadashi vrat katha vidhi

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को आमलकी एकादशी कहा गया है। यह एकादशी इस वर्ष 23 मार्च को है। आमलकी का अर्थ होता है आंवला इस एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के समान है।

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जिस तरह अक्षय नवमी में आंवले के वृक्ष की पूजा होती है उसी प्रकार आमलकी एकादशी के दिन आंवले की वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

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आमलकी एकादशी के विषय में कई पुराणों में वर्णन मिलता है। आध्यात्मिक विषयों के जानकार 'पण्डित जयगोविंद शास्त्री' बताते हैं कि अमालकी एकादशी के दिन आंवले की पूजा का महत्व इसलिए है क्योंकि इसी दिन सृष्टि के आरंभ में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी।
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इस संदर्भ में कथा है कि विष्णु की नाभि से उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा जी के मन में जिज्ञासा हुई कि वह कौन हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई।

इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ब्रह्मा जी परब्रह्म की तपस्या करने लगे। ब्रह्म जी की तपस्या से प्रश्न होकर परब्रह्म भगवान विष्णु प्रकट हुए। विष्णु को सामने देखकर ब्रह्मा जी खुशी से रोने लगे।

इनके आंसू भगवान विष्णु के चरणों पर गिरने लगे। ब्रह्मा जी की इस प्रकार भक्ति भावना देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। और ब्रह्मा जी के आंसूओं से आमलकी यानी आंवले का वृक्ष उत्पन्न हुआ।

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा कि आपके आंसूओं से उत्पन्न आंवले का वृक्ष और फल मुझे अति प्रिय रहेगा। जो भी आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करेगा उसके सारे पाप समाप्त हो जाएंगे और व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी होगा।

अमालकी एकादशी की कथा में इस संदर्भ में एक राजा की कथा का उल्लेख किया गया है जो पूर्व जन्म में एक शिकारी था।

एक बार आमलकी एकादशी के दिन जब सभी लोग मंदिर में एकादशी का व्रत करके भजन और पूजन कर रहे थे तब मंदिर में चोरी के उद्देश्य से वह मंदिर के बाहर छुप कर बैठा रहा।

मंदिर में चल रही पूजा अर्चना देखते हुए वह लोगों के जाने का इंतजार कर रहा था। अगले दिन सुबह हो जाने पर शिकारी घर चला गया।

इस तरह अनजाने में शिकारी से आमलकी एकादशी का व्रत हो गया। कुछ समय बाद शिकारी की मृत्यु हुई और उसका जन्म राज परिवार में हुआ।

पण्डित जी कहते है कि कई जगहों पर भगवान विष्णु के थूक से आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति की कथा मिलती है जो सही नहीं है। अगर आंवला भगवान का थूक है तो वह भगवान को इतना प्रिय नहीं हो सकता।


आमलकी एकादशी व्रत विधिः
एकादशी के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु एवं आंवले के वृक्ष की पूजा करें। अगर आंवले का वृक्ष उपलब्ध नहीं हो तो आंवले का फल भगवान विष्णु को प्रसाद स्वरूप अर्पित करें।

घी का दीपक जलकार विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जो लोग व्रत नहीं करते हैं वह भी इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करें और स्वयं खाएं भी।

शास्त्रों के अनुसार आमलकी एकादशी के दिन आंवले का सेवन भी पाप का नाश करता है।

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