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मकान की चाहत रखने वालों को ब्रह्मा जी की यह बात याद रखनी चाहिए

Wed, 20 Jan 2016 03:21 PM IST
- स्वामी रामसुखदास
- स्वामी रामसुखदास Updated Wed, 20 Jan 2016 03:21 PM IST
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world is very big and old

इंद्र ने एक बार अपना विशाल प्रासाद बनाने का निश्चय किया। इसके लिए देवों के वास्तुकार विश्वकर्मा को नियुक्त किया गया। सौ वर्ष बीत जाने पर भी भवन पूरा नहीं हुआ। थककर विश्वकर्मा ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा को इंद्र पर हंसी आई और विश्वकर्मा पर दया। बटुक का रूप धारण कर वह इंद्र के पास गए और पूछने लगे, 'देवेंद्र! मैं आपके अद्भुत भवन के बारे में सुनकर यहां आया। इसके निर्माण में कितने विश्वकर्माओं को लगाया होगा?'

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तभी वहां चींटियों का एक विशाल समूह दिखाई दिया। उन्हें देखते ही बटुक को हंसी आ गई। इंद्र ने कारण पूछा, तो वह कहने लगे, 'देवराज! यह जो आप चींटियों का समूह देख रहे हैं न, वे सब कभी इंद्र रह चुकी हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। जो आज देवलोक में है, वह कभी कीट, वृक्ष या अन्य स्थावर योनियों को प्राप्त हो सकता है।'
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फिर एक ज्ञानी तथा वयोवृद्ध महात्मा वहां आए। इंद्र ने उनका सत्कार किया। बटुक ने उनसे कुशलक्षेम पूछा। मुनि ने कहा, 'बटुकश्रेष्ठ! आयु का क्या ठिकाना, इसलिए मैंने कहीं घर नहीं बनाया, न विवाह किया और न जीविका का साधन जुटाया। वक्षस्थल के लोमचक्रों के कारण लोग मुझे लोमश कहते हैं।

मेरे वक्षस्थल के रोम मेरी आयु के प्रमाण हैं। जब एक इंद्र का पतन होता है, तो मेरा एक रोआं गिर पड़ता है। यह कहकर महर्षि लोमश चल दिए। ब्राह्मण बटुक भी अंतर्धान हो गए। रह गए अकेले इंद्र। वह महर्षि लोमश की बात पर विचार करने लगे कि जिनकी इतनी दीर्घ आयु है, वह तो एक झोंपड़ी भी नहीं बनवाते। फिर मैं क्यों विशाल भवन के चक्कर में पड़ा हुआ हूं? फिर क्या था! इंद्र ने काम रुकवा दिया और वहीं से वन चले गए।

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