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जीव-जंतुओं से भी सीखा जा सकता है
शिवकुमार गोयल
Updated Sun, 16 Mar 2014 06:28 PM IST
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गंधर्वराज विश्ववसु की पुत्री मदालसा परम तपस्वी और विद्वान महिला थीं। वह अपने पुत्रों को उपदेश दिया करती थीं कि शरीर क्षणभंगुर है, आत्म तत्व ही सब कुछ है। सांसारिक मोहजाल में फंसकर जीवन नहीं गंवाना चाहिए।
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मदालसा के पति राजा ऋतध्वज ने एक दिन कहा, प्रिये! तुम तीन बच्चों को ज्ञानोपदेश देकर सांसारिक जगत से विरत कर चुकी हो। चौथे पुत्र अलर्क को तो राजधर्म का उपदेश दो, जिससे वह वंश को आगे बढ़ा सके।
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मदालसा ने पति का आदेश शिरोधार्य कर अलर्क को आदर्श राजधर्म निभाने की शिक्षा देनी शुरू कर दी। एक दिन मदालसा ने कहा, पुत्र, हम पशु-पक्षियों के जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। कौवे से आलस्य रहित रहने की शिक्षा लेनी चाहिए। भौरों से रसग्राही और मृग से सदा चौकन्ना रहने की सीख लेनी चाहिए।
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जैसे सर्प फण फैलाकर, फुंफकारकर अपनी रक्षा के लिए दूसरों को डराता है, उसी प्रकार राजा को शत्रु को डराकर आतंकित रखना चाहिए। राजा को हंस के समान नीर-क्षीर विवेक करनेवाला होना चाहिए। मुर्गे की तरह सूर्योदय से पहले उठकर कर्तव्यपालन में लग जाना चाहिए। उन्होंने अपने बेटे को सभी के साथ समान व्यवहार करने की शिक्षा देते हुए कहा, जैसे चंद्रमा और सूर्य सर्वत्र समान रूप से अपनी ऊर्जा का प्रसार करते हैं, वैसे ही राजा को समस्त प्रजा के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। वही राजा अमर होता है, जो प्रजा हित को महत्व देता है।