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सत्कर्म करते रहने में कल्याण
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 26 Feb 2014 07:01 PM IST
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विधि का नियम है कि मानव को जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत कुछ-न-कुछ कर्म करते रहना पड़ता है। इसलिए धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य को हर क्षण सत्कर्म में ही व्यतीत करना चाहिए। सत्कर्म करते रहने में ही जीवन की सार्थकता है। आदि शंकराचार्य कहते हैं, जो पुरुषार्थहीन है, वह वास्तव में जीते-जी मरा हुआ है।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु। यानी बुद्धिमान को उचित जीवनचर्या एवं पुरुषार्थ में लगे रहना चाहिए। एक क्षण भी आलस्य, प्रमाद, भोग या किसी अन्य प्रकार के दुष्कर्म में कदापि नहीं खोना चाहिए। मुनि याज्ञवल्क्य कहते हैं, व्यक्ति यदि अपने कर्म को धर्म, कर्तव्य एवं पूजा मानकर करे, तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है।
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धर्मशास्त्रों में न्यायोचित्त धनार्जन करते हुए भक्ति, सेवा, परोपकार, दान, स्वाध्याय, अतिथि सेवा, सत्संग आदि सत्कर्म में रत रहने की प्रेरणा दी गई है। असत्य भाषण, बेईमानी, हिंसा, असंयम, अभक्ष्य भक्षण अर्थात मांस-मदिरा तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन आदि को निंदित कर्म बताकर इनसे बचने को कहा गया है।
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स्कंदपुराण में कहा गया है, निषिद्ध कर्म करने एवं विहित कर्मों का त्याग करने से मनुष्य के पुण्य नष्ट हो जाते हैं तथा उसे तरह-तरह के संकट घेरकर दुरावस्था को पहुंचा देते हैं। अतः हर क्षण सत्कर्म करते रहने में ही मानव का कल्याण है।