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जब पांच दानों से सेठ की बहू ने भर दिया पूरा कोठार

Wed, 26 Mar 2014 09:20 AM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 26 Mar 2014 09:20 AM IST
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The bride pantry filled with five grains

राजगृह में धन्य नामक बुद्धिमान सेठ रहता था। उसकी पत्नी का निधन हो गया। उसकी चार पुत्रवधुएं थीं- उज्झिका, भोगवती, रक्षिका और रोहिणी। सेठ ने सोचा कि क्यों न इन चारों बहुओं को परखकर किसी एक को घर का दायित्व सौंप दिया जाए।

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एक दिन उसने चारों बहुओं को पास बिठाया और कहा, मैं तुम चारों को धान के पांच-पांच दाने देता हूं। इन्हें संभालकर रखना और जब मैं मांगूं, उन्हें लौटा देना। चारों दाने लेकर चली गईं।
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बड़ी बहू ने सोचा कि चूंकि कोठार में धान भरा हुआ है, इसलिए जब ससुर जी मांगेंगे, तो वहां से पांच दाने लाकर दे दूंगी। दूसरी ने भी यही सोचा। तीसरी ने दानों को रेशमी कपड़े में बांधा और रत्नों से भरी पेटिका में रख दिया। चौथी रोहिणी सत्संग किया करती थी।
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उसने सोचा कि कोई भी सत्कर्म करने से वे बढ़ते रहते हैं, इसलिए उसने पांचों दाने अपने खेत में बो दिया। उससे जो फसल पैदा हुई, उसने उन्हें फिर से खेत में रोप दिया। इस तरह उसके पास इतना धान हो गया कि उसका कोठार भर गया।


पांच वर्ष बाद सेठ ने बहुओं से दाने वापस मांगे। शुरू की तीन बहुओं ने दाने वापस कर दिए, पर रोहिणी ने सारी कहानी सुनाते हुए कहा, पिताजी, वे पांच दाने कोठार में बंद हैं। यह सुनकर सेठ प्रसन्न हुआ और उसने कहा, जिस प्रकार धान बोने से बढ़े हैं, उसी प्रकार सेवा-परोपकार से पुण्य बढ़ते हैं। उसने घर की मालकिन छोटी बहू को बना दिया।

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