{"_id":"a79f67d95fccd6fa818ac9a946404c2e","slug":"shive-kamdev-rati-holi-hindi-rk","type":"story","status":"publish","title_hn":"किस तरह से कामदेव मन को प्रेम और वासना की ओर ले जाते हैं","category":{"title":"Metaphysical","title_hn":"परामनोविज्ञान","slug":"metaphysical-parasychology"}}
किस तरह से कामदेव मन को प्रेम और वासना की ओर ले जाते हैं
गोपीनाथ कविराज
Updated Sat, 07 Mar 2015 03:07 PM IST
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शिव की समाधि भंग करने के लिए कामदेव ने अपना पुष्पबाण चलाया, ताकि उन्हें पार्वती के प्रति आकर्षित किया जा सके। शिव की तपस्या भंग हो गई। उन्होंने कामदेव को सामने देखा। देखकर शिवजी को क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया।
फिर शिव ने पार्वती की ओर देखा। हिमवान की पुत्री पार्वती की आराधना सफल हुई और शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। लेकिन होली की कथा इसके बाद शुरू होती है। देवताओं और उनसे ज्यादा पार्वती का मनोरथ सिद्ध करते हुए कामदेव भस्म हो गए। उनकी पत्नी रति को असमय ही वैधव्य सहना पड़ा।
रति ने शिव की आराधना की। वह जब अपने निवास पर लौटे, तो कहते हैं कि रति ने उनसे अपनी व्यथा कही। पार्वती के पिछले जन्म की बातें याद कर शिव ने जाना कि कामदेव निर्दोष हैं। पिछले जन्म में दक्ष प्रसंग में उन्हें अपमानित होना पड़ा था।
उनके अपमान से विचलित होकर दक्षपुत्री सती ने आत्मदाह कर लिया। उन्हीं सती ने पार्वती के रूप में जन्म लिया और इस जन्म में भी शिव का ही वरण किया। कामदेव ने तो उन्हें सहयोग ही दिया। शिव की दृष्टि में कामदेव फिर भी दोषी हैं, क्योंकि वह प्रेम को शरीर के तल तक सीमित रखते और उसे वासना में गिरने देते हैं।
इसका उपाय रचकर शिव ने कहा कि काम का पुष्पबाण अब मन को ही बींधेगा। उन्होंने कामदेव को जीवित कर दिया। उसे नया नाम दिया मनसिज। कहा कि अब तुम अशरीरी हो। उस दिन फागुन की पूर्णिमा थी। आधी रात गए लोगों ने होली का दहन किया था। सुबह तक उसकी आग में वासना की मलिनता जलकर प्रेम के रूप में प्रकट हो चुकी थी।
कामदेव अशरीरी भाव से नए सृजन के लिए प्रेरणा जगाते हुए विजय का उत्सव मनाने लगे। यह दिन होली का दिन होता है। कई इलाकों में आज भी रति के विलाप को लोकधुनों और संगीत में उतारा जाता है।