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मृत्यु के समय दशरथ जी को यह एहसास हुआ
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 22 Nov 2013 01:42 PM IST
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अपने पुत्र श्रीराम को राज्याभिषेक की जगह चौदह वर्ष के वनवास की आज्ञा देने की विवशता से दुखी दशरथ जी अत्यंत पीड़ा का अनुभव कर रहे थे। हर क्षण उनके मुख से 'राम-राम' निकल रहा था। कौशल्या जी के पास बैठे-बैठे वह बोले, मुझे राम के दर्शन कराओ।
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कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा, जिसका अगले दिन राज्याभिषेक हो, उसे वनवास की आज्ञा मिले, फिर भी उसके चेहरे पर आक्रोश नहीं-भला ऐसा आज्ञाकारी पुत्र राम के अलावा कौन हो सकता है?
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भरत का राज्याभिषेक करने के बाद उससे कहना कि रघुवंश की संस्कृति, भ्रातृभाव न टूटने पाए। राम रघुवंश के मणि हैं। वनवास पूरा करने के बाद उस मणि को राज सिंहासन पर आसीन करने में ही हमारे कुल का गौरव है।
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उन्होंने आगे कहा, तीनों वनवास से वापस आ जाएं, तो कहना कि तुम्हारे पिता ने तुम्हारा नाम लेते-लेते प्राण त्याग दिए। फिर उन्होंने कौशल्या से पूछा, क्या सामने की दीवार में कुछ दिखाई देता है? कौशल्या, सुमित्रा और सुमंत ने कहा, हमें तो केवल दीवार दिखाई दे रही है।
दशरथ ने कहा, श्रवण कुमार के गरीब मां-बाप ने मुझे शाप दिया था कि जिस प्रकार वे पुत्र वियोग का दुख भोग रहे हैं, उसी प्रकार मेरी मौत भी पुत्र वियोग में होगी। चार पुत्रों में से कोई भी मेरे मुंह में पानी डालने वाला न होगा।
कौशल्या! कर्म भोगे बिना कोई चारा नहीं...। और यह कहते-कहते दशरथ जी की आंखों से आंसू बहने लगे।