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जानवरों से यह गुण सीख लीजिए, खूब प्यार मिलेगा
विष्णु प्रभाकर
Updated Tue, 17 Jun 2014 11:05 AM IST
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उसके मन में इच्छा हुई कि भारत और पाक के बीच बनी सीमा-रेखा देखी जाए। देखें कि जो कभी एक देश था, वह अब दो होकर कैसा लगता है। दो देश हो गए थे, तो दोनों एक-दूसरे के प्रति शंकालु भी थे। दोनों ओर पहरा था।
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बीच में कुछ भूमि होती है, जिस पर किसी का अधिकार नहीं होता। दोनों उस पर खड़े हो सकते हैं। वह वहीं खड़ा था, लेकिन अकेला नहीं था पत्नी थी और थे अठारह सशस्त्र सैनिक और उनका कमांडर।
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कमांडर ने उसके कान में कहा, उधर के सैनिक आपको चाय के लिए बुला सकते हैं, जाना मत। पता नहीं, क्या हो जाए? सीमा पर रहने वाले लोगों को देखने आए उस नागरिक ने हामी भरी। फिर मन ही मन कहा, मुझे आप इतना मूर्ख कैसे समझते हैं? मैं इंसान हूं, अपने-पराये में भेद करना मैं जानता हूं।
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वह यह सब सोच ही रहा था कि सचमुच उधर के सैनिक वहां आ पहुंचे। रोबीले पठान थे। बड़े तपाक से हाथ मिलाया। उस दिन ईद थी। उसने उन्हें मुबारकबाद कहा। उन्होंने आग्रह किया, इधर तशरीफ लाइए। हम लोगों के साथ चाय पीजिए।
इसका उत्तर उसके पास तैयार था। अत्यंत विनम्रता से मुस्कराकर उसने कहा, बहुत-बहुत शुक्रिया। बड़ी खुशी होती आपके साथ बैठकर, लेकिन मुझे आज ही वापस लौटना है और वक्त बहुत कम है। आज तो माफी चाहता हूं।
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इसी प्रकार शिष्टाचार की कुछ और बातें हुईं कि उधर से कुलांचें भरता हुआ बकरियों का एक दल उनके पास से गुजरा और भारत की सीमा में दाखिल हो गया। सबने उनकी ओर देखा। एक क्षण बाद उसने पूछा, ये आपकी हैं? उनमें से एक सैनिक ने गहरी मुस्कराहट के साथ उत्तर दिया, जी जनाब, हमारी हैं। जानवर हैं। अपने पराए का फर्क करना नहीं जानते।