{"_id":"9a32abae4786470f5197535e80af8e5c","slug":"greedless-conduct-made-the-rajpandit","type":"story","status":"publish","title_hn":"आया था भीख मांगने और बन गया राज पंडित","category":{"title":"Metaphysical","title_hn":"परामनोविज्ञान","slug":"metaphysical-parasychology"}}
आया था भीख मांगने और बन गया राज पंडित
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 31 Mar 2014 01:38 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कौशांबी के राजा जितशत्रु ने चौदह विद्याओं में पारंगत तथा परम तपस्वी ब्राह्मण काश्यप को राजपंडित मनोनीत किया था। अचानक काश्यप की मृत्यु हो गई। उनके पुत्र कपिल ने एक दिन अपनी मां से पूछा, मां, जब राजा का पुत्र राजा की जगह ले सकता है, तो मैं राजपंडित क्यों नहीं बन सकता?
विज्ञापन
पढ़ें, साप्ताहिक राशिफल 31 से 6 अप्रैल तक
विज्ञापन
मां ने कहा, राजपंडित की पदवी तेरे पिता को विद्वान, त्यागी, तपस्वी होने के कारण मिली थी। यदि तू भी विद्वान हो जाएगा, तो तुझे भी वह पदवी मिल सकती है। वह श्रावस्ती चला गया और वहां एक सेठ के पास रहने लगा। सेठ की दासी ने देखा कि कपिल धनाभाव में दिन काटता है, तो उसने उसे बताया कि श्रावस्ती के राजा का जो कोई सुबह-सवेरे सबसे पहले अभिनंदन करता है, उसे वह दो स्वर्ण मुद्राएं देता है।
विज्ञापन
पढ़ें, खजुराहो की कामुक मूर्तियों की हैरान करने वाली दास्तान
कपिल राजमहल की ओर चल पड़ा। वहां उसे द्वारपालों ने चोर समझकर पकड़ लिया। उसे राजा के पास ले जाया गया। कपिल ने बता दिया कि वह स्वर्ण मुद्राएं लेने महल में आया है। राजा यह सुनकर प्रसन्न हुआ और उसे मनमाफिक चीज मांगने को कहा।
पढ़ें, 31 मार्च से शुरू हो रहा हिन्दू नववर्ष आपके लिए कैसा रहेगा
कपिल ने सोचा कि एक सौ स्वर्ण मुद्राएं मांग ली जाए, पर अचानक उसे गुरु के शब्द याद आ गए कि ब्राह्मण को लोभ-लालच से दूर रहना चाहिए। उसने राजा से माफी मांगी और कहा कि उसे कुछ नहीं चाहिए। राजा ने उसके निर्लोभी आचरण को देखते हुए उसे श्रावस्ती का राजपंडित बना दिया।