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आखिर, इन्द्र का वरदान क्यों बन गया अभिशाप
पर्वतीय लोककथा
Updated Fri, 12 Sep 2014 12:41 PM IST
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एक व्यक्ति की प्रार्थनाओं से परेशान होकर देवताओं ने इंद्र से कहा, 'यह व्यक्ति वर देने योग्य नहीं है, परंतु लगातार प्रार्थना कर रहा है। इसे टालना भी कठिन है। परेशानी यह है कि वह वरदान का दुरुपयोग कर सकता है।' इंद्र ने कुछ देर विचारा और कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है, उसे वर दे दो।
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देवताओं ने उस व्यक्ति से कुछ मांगने को कहा। व्यक्ति ने तीन इच्छाएं पूरी होने का वर मांगा। देवताओं ने उसे तीन गोले दे दिए और कहा कि जब भी कुछ मांगने की इच्छा हो, एक गोले को जमीन पर गिराकर फोड़ देना और जो भी चाहो मांग लेना। पर ध्यान रखना कि एक गोला एक ही बार काम करेगा।
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व्यक्ति खुशी और उत्साह से भागता हुआ घर पहुंचा। कमरे में घुस ही रहा था कि उसका बेटा भागकर आया और उससे लिपट गया। इससे उस व्यक्ति का संतुलन बिगड़ गया और एक गोला नीचे गिरकर फूट गया। उसने बेटे को डपटते हुए कहा कि यह क्या किया। तुम्हारी आंखें नहीं हैं! इतना कहते ही उसके बेटे की दोनों आंखें गायब हो गईं।
वह बुरी तरह रोने लगा। उसे बाकी दोनों गोले याद आए। उसने एक और गोला अपने हाथ में लिया और आंखें बंद करके गोला जमीन पर गिराकर फोड़ दिया और मांगा कि मेरे बेटे की आंखें वापस आ जाएं। उसने बेटे की तरफ देखा, तो वह आश्चर्य और दुख से भर गया कि उसके बेटे के चेहरे में आंखें ही आंखें लग गईं थीं। अब व्यक्ति को अपनी गलती का अहसास होने लगा।
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उसने तीसरा गोला भी फोड़ा और मांगा कि उसके बेटे का चेहरा सामान्य हो जाए। इस तरह से उसके तीनों वर बेकार हो गए। जीवन में पात्रता और वाणी का संयम, दोनों बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं। पात्रता कमाएं लेकिन वर और देवकृपा के फेर में न पड़ें।