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तब आप अपना एक रुपया खर्च करने से पहले हजार बार सोचेंगे
-आनंद स्वामी
Updated Wed, 01 Apr 2015 12:55 PM IST
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खुशहालपुर में नारायण नामक साहूकार का एक बेटा था। उसका नाम था राजू। वैसे तो वह बुद्धू नहीं था, लेकिन गलत संगत में बिगड़ गया था। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, पैसे खर्च करने की उसकी आदत बढ़ती गई और वह अपने दोस्तों के कहने पर पानी की तरह पैसा बहाने लगा। यह देखकर नारायण को चिंता होने लगी। उन्होंने एक विद्वान संत की सलाह पर एक दिन राजू से कहा कि वह रोज शाम होने तक कुछ कमाई करके लाए, तभी उसे खाना मिलेगा।
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यह सुनकर राजू डर गया। यह देखकर उसकी मां का मन द्रवित हो उठा। उसने राजू को एक रुपया दिया। राजू ने शाम को अपने पिता के सामने वह रुपया रखा। पिता ने कहा, इसे कुएं में फेंक दो। राजू ने बिना झिझके वह रुपया पानी में फेंक दिया। नारायण माजरा समझ गए। उन्होंने पत्नी को मायके भेज दिया।
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अगले दिन राजू अपनी बड़ी बहन के पास गया और गिड़गिड़ाया। तरस खाकर बहन ने भी उसे पांच रुपये दिए। उस दिन भी पिता के कहने पर राजू ने पैसे कुएं में फेंक दिए। यह पता चलने पर कि राजू की मदद बड़ी बेटी ने की है, नारायण ने उसे भी आने से रोक दिया। तीसरे दिन राजू के लिए मुश्किलें बढ़ गईं। इस बार न मां थी, और न ही बहन। हार कर वह काम ढूंढने निकला। उसे पीठ पर बोझा ढोने का काम मिला। दो घंटे मेहनत के बाद उसे एक रुपया नसीब हुआ।
उस दिन भी नारायण ने रुपये को कुएं में फेंकने के लिए कहा। अब राजू छटपटाया। उसने अनुरोध किया कि एक रुपया कमाने में उसने काफी पसीना बहाया है। उसने पिता से अनुरोध किया कि वह उसे फेंक नहीं सकता। जैसे ही ये शब्द उसके मुंह से निकले, नारायण खुश हुआ। उन्हें अब कुछ कहने की जरूरत नहीं थी।