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स्नान कर रह थी देवी पार्वती तभी उत्पन्न हुई उनसे यह देवी
महर्षि मार्कंडेय
Updated Mon, 23 Mar 2015 08:51 AM IST
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अंहकार और उसके लिए हिंसा के किसी भी स्तर तक जाने के लिए तैयार शुंभ और निशुंभ इंद्र को जीतने की ताक में थे। इसके लिए पुष्कर में जाकर उन्होंने तपस्या की। ब्रह्मा से उन्होंने इंद्र को पराजित कर तीनों लोकों पर अधिकार पाने का वरदान मांगा। ब्रह्मा ने वर तो दिया पर इस शर्त के साथ कि एक अयोनिज देहधारी कन्या के हाथों उनकी मृत्यु होगी।
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इस शर्त को मानते हुए शुंभ निशुंभ ने तीनों लोकों में राज्य स्थापित कर लिया। इंद्र उनसे हार पत्नी शची और देवताओं के साथ स्वर्ग से चले गए। शुंभ निशुंभ के अत्याचार बढ़ने लगे। मदोन्मत्त हो कर दोनों असुर तीनों भुवनों पर चौबीस महायुगों तक शासन करते रहे।
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इसी बीच हिमवंत की पुत्री पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या की। शंकर प्रसन्न हुए। तपस्या करते हुए वह भद्रकाली के रूप में विख्यात हुईं। एक बार देवता विष्णु की अनेक रीतियों से स्तुति कर रह थे। उसी समय पार्वती गंगा में स्नान करने निकली। मार्ग में देवताओं ने उन्हें देखा और अपनी व्यथा कही। उसी दौरान पार्वती की देह से एक कांतिमति शक्ति प्रकट हुई। उस शक्ति ने प्रणाम कर पूछा कि मेरा कर्तव्य क्या है?
पार्वती ने हिमालय के दक्षिण शिखर पर रह रहे शुंभ और निशुंभ का वध करने के लिए कहा। इसके बाद कुछ ऐसा हुआ कि शुंभ निशुंभ को कौशिकी के रूप सौंदर्य के बारे में मालूम हुआ। उन्होंने संदेश भिजवाया कि कौशिकी या तो राक्षसराज का वरण करे अथवा प्राणों से हाथ धोने के लिए तैयार रहे।
स्वाभाविक ही कौशिकी ने मना किया। कुपित हो कर शुंभ-निशुंभ ने कौशिकी का हरण करना चाहा। युद्ध हुआ और दोनों राक्षस अपनी सेना समेत मारे गए।
इसके बाद भुवन मोहिनी का रूप धरकर वह शक्ति हिमालय पर्वत के दक्षिण शिखर पर स्वर्णिम जंजीरों वाले हिंडोले पर झूलते समय तन्मय हो संगीत का आलाप करने लगी। कथा का संदेश है कि उद्धत अंहकार कितना ही बली क्यों न हो, उसका पराभव सुनिश्चित है।