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हर विवाद का कारण है यह, आप भी इंकार नहीं कर पाएंगे
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 12 Mar 2014 09:11 AM IST
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सभी धर्मों में क्रोध को सर्वनाश का प्रमुख कारण बताया गया है। महाभारत में कहा गया है कि निद्रा तंद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रिता। इसलिए आलस्य एवं क्रोध आदि दुर्गुणों को छोड़ने में ही कल्याण है। क्रोध के कारण मानव आवेश में आकर विवेक खो बैठता है तथा उसका दुष्परिणाम कई बार घातक होता है।
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आचार्य महाप्रज्ञ ने लिखा है, अहंकार आदमी को असहिष्णु बनाता है। जब आदमी अहंकार में स्वयं को सब कुछ मानने लगता है, तब उसकी अहं भावना क्रोध को जन्म देती है। सहनशीलता के अभ्यास से ही क्रोध पर काबू पाया जा सकता है।
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कृष्णानंद जी आरोग्य में लिखते हैं, क्रोध रूपी आग, जो आप अपने शत्रुओं के लिए हृदय में जलाते हैं, वह शत्रु से अधिक आपको जलाती है। क्रोध शरीर में जहर के समान काम करता है।
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इसलिए जब क्रोध आने लगे, तो उसके कारण को खत्म करने का उपाय कीजिए। शत्रुता, बुरा बर्ताव, घृणा, घबराहट, कठोरता, परेशानी, उद्वेग- ये सभी क्रोध के पर्याय हैं। क्रोध अकेला नहीं आता। वह दुख और दरिद्रता को जन्म देता है।
एक व्यक्ति ने क्रोध पर विजय पाने के अनुभव का कुछ ऐसे चित्रण किया है- मैंने भगवान की प्रार्थना का सहारा लिया और स्वयं को अकिंचन मानकर तथा बड़प्पन की झूठी भावना त्यागकर विनम्रता का व्यवहार करने लगा। घृणा, द्वेष, आलोचना जैसे दुर्गुण स्वतः समाप्त होते चले गए।