वह तपस्या छोड़कर राजा बनने चले आए आखिर क्यों

शिवकुमार गोयल Updated Fri, 22 Nov 2013 01:45 PM IST
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सप्तद्वीप नवखंड पर कई दशकों तक राज्य करने वाले राजराजेश्वर वैभवपूर्ण जीवन जीने के बाद अपने अल्पायु पुत्र को सत्ता सौंपकर वन में चले गए। वहां वह घोर तपस्या में लीन हो गए। वह केवल एक समय फलाहार करते।
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वर्षों तक साधना करने पर भी उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त नहीं हुई। उन्हें समाचार मिलते रहते थे कि उनके चले आने के कारण प्रजा बहुत परेशान है।
एक दिन उन्हें खाने के लिए फल नहीं मिला। वह भोजन की तलाश में निकल पड़े। एक खलिहान के पास से जब वह गुजर रहे थे, तो खेत में श्रम करते एक किसान की दृष्टि उन पर पड़ी। किसान ने उन्हें प्रणाम किया और बोला, पास आओ बाबा। किस वस्तु की तलाश में हो? उसे जवाब मिला, भूख से व्याकुल हूं।
यह सुनकर किसान ने कहा, मेरे पास दाल-चावल हैं। झोपड़ी में चूल्हा है। खिचड़ी पकाओ। दोनों खाकर भूख मिटाएंगे।

राजराजेश्वर ने खिचड़ी पकाई। दोनों ने भरपेट भोजन किया और फिर वृक्ष की छाया में लेट गए। सपने में उन्होंने देखा कि एक विराट पुरुष उनसे कह रहा है, राजन, मैं कर्म हूं। इस सृष्टि का परम तत्व। तुम प्रजा का हित साधन करते हुए जो उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते थे, वह वन में तपस्या से नहीं कर सके। अपने कर्तव्य का पालन करना ही सबसे बड़ा तप है।

राजराजेश्वर का विवेक जाग उठा। वह वापस लौट आए और प्रजा के हित साधन में लग गए।
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