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Mahakumbh 2025: महाकुंभ क्यों लगता है? जानिए इसकी विशेषता और महत्व
Sun, 08 Dec 2024 03:01 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sun, 08 Dec 2024 03:01 PM IST
सार
Mahakumbh 2025: महाकुंभ 13 जनवरी से आरंभ हो रहा है और 26 फरवरी 2025 को इसका समापन होगा। यानी यह कुंभ मेला पूरे 45 दिनों तक चलेगा।
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महाकुंभ का उल्लेख समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Mahakumbh 2025: महाकुंभ का आयोजन भारत के चार पवित्र स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में हर 12 साल के अंतराल पर होता है। यह विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। 2025 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन किया जाएगा, जिसमें लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम में स्नान करेंगे। इसे लेकर सरकार ने व्यापक तैयारियां शुरू की हैं। इसमें अत्याधुनिक तकनीक, सुरक्षा और सुविधाओं का ध्यान रखा जाएगा ताकि श्रद्धालुओं के लिए यह अनुभव सहज और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हो।
महाकुंभ न केवल धार्मिक पर्व है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और एकता का प्रतीक है। 2025 का महाकुंभ आने वाले समय में नई पीढ़ी के लिए धर्म और संस्कृति के महत्व को समझाने का एक महत्वपूर्ण अवसर बनेगा। यह महाकुंभ 13 जनवरी से आरंभ हो रहा है और 26 फरवरी 2025 को इसका समापन होगा। यानी यह कुंभ मेला पूरे 45 दिनों तक चलेगा।
ग्रह-नक्षत्रों की चाल से महाकुंभ का संबंध
महाकुंभ 2025 जो प्रयागराज में शुरू होने जा रहा है उसका आधार है जब देवगुरु बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में होते हैं, तो महाकुंभ प्रयागराज में आयोजित होता है। 2025 में यही स्थिति होने के कारण महाकुंभ प्रयागराज में आयोजित किया जा रहा है।
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Mahakumbh 2025: अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ में क्या है अंतर? जानें ग्रहों के गोचर से इसका संबंध
प्रत्येक बारह वर्ष बाद जब बृहस्पति वृष राशि में आते हैं तो वृष राशि के बृहस्पति की उपस्थिति में कुम्भ महापर्व आयोजित होता है, इससे पहले 2013 में महाकुंभ का संयोग बना था। अमृत कलश की रक्षा के समय जिन-जिन राशियों पर जो-जो ग्रह गोचर कर रहे थे, कलश की रक्षा करने वाले वही चन्द्र, सूर्य, गुरु आदि ग्रह जब उसी अवस्था में संचरण करते हैं, उस समय कुंभ पर्व का योग बनता है। यानि जब फिर से वैसे-वैसे संयोग ग्रहों के योग के रूप में बनते हैं, तभी कुंभ महापर्व का आयोजन होता है। धर्मशास्त्रों में वर्णन आता है।
मकरे च दिवानाथे वृषराशिगते गुरौ। प्रयागे कुम्भयोगौ वै माघमासे विधुक्षये।।
महत्व और पौराणिक कथा
महाकुंभ का उल्लेख समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ। अमृत की बूंदें चार स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक पर गिरीं। इन्हीं स्थानों पर महाकुंभ का आयोजन होता है।
मान्यता है कि महाकुंभ के दौरान संगम में स्नान करने से आत्मा के बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक जागरूकता
महाकुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं है यह समाज को आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।
संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण
यह आयोजन भारतीय संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं का जीवंत प्रतीक है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
महाकुंभ के दौरान गंगाजल में औषधीय गुण बढ़ जाते हैं। इसका वैज्ञानिक अध्ययन भी किया गया है, जो इस पर्व की महिमा को और बढ़ाता है।
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महाकुंभ न केवल धार्मिक पर्व है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और एकता का प्रतीक है। 2025 का महाकुंभ आने वाले समय में नई पीढ़ी के लिए धर्म और संस्कृति के महत्व को समझाने का एक महत्वपूर्ण अवसर बनेगा। यह महाकुंभ 13 जनवरी से आरंभ हो रहा है और 26 फरवरी 2025 को इसका समापन होगा। यानी यह कुंभ मेला पूरे 45 दिनों तक चलेगा।
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ग्रह-नक्षत्रों की चाल से महाकुंभ का संबंध
महाकुंभ 2025 जो प्रयागराज में शुरू होने जा रहा है उसका आधार है जब देवगुरु बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में होते हैं, तो महाकुंभ प्रयागराज में आयोजित होता है। 2025 में यही स्थिति होने के कारण महाकुंभ प्रयागराज में आयोजित किया जा रहा है।
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Mahakumbh 2025: अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ में क्या है अंतर? जानें ग्रहों के गोचर से इसका संबंध
प्रत्येक बारह वर्ष बाद जब बृहस्पति वृष राशि में आते हैं तो वृष राशि के बृहस्पति की उपस्थिति में कुम्भ महापर्व आयोजित होता है, इससे पहले 2013 में महाकुंभ का संयोग बना था। अमृत कलश की रक्षा के समय जिन-जिन राशियों पर जो-जो ग्रह गोचर कर रहे थे, कलश की रक्षा करने वाले वही चन्द्र, सूर्य, गुरु आदि ग्रह जब उसी अवस्था में संचरण करते हैं, उस समय कुंभ पर्व का योग बनता है। यानि जब फिर से वैसे-वैसे संयोग ग्रहों के योग के रूप में बनते हैं, तभी कुंभ महापर्व का आयोजन होता है। धर्मशास्त्रों में वर्णन आता है।
मकरे च दिवानाथे वृषराशिगते गुरौ। प्रयागे कुम्भयोगौ वै माघमासे विधुक्षये।।
महत्व और पौराणिक कथा
महाकुंभ का उल्लेख समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ। अमृत की बूंदें चार स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक पर गिरीं। इन्हीं स्थानों पर महाकुंभ का आयोजन होता है।
Mahakumbh 2025: आखिर 12 वर्ष बाद ही क्यों होता है महाकुंभ का आयोजन? जानें इसका धार्मिक महत्व
Maha Kumbh 2025: कब से शुरू हो रहा है महाकुंभ? जानें शाही स्थान की तिथियां और महत्व
मोक्ष की प्राप्तिमान्यता है कि महाकुंभ के दौरान संगम में स्नान करने से आत्मा के बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक जागरूकता
महाकुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं है यह समाज को आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।
संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण
यह आयोजन भारतीय संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं का जीवंत प्रतीक है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
महाकुंभ के दौरान गंगाजल में औषधीय गुण बढ़ जाते हैं। इसका वैज्ञानिक अध्ययन भी किया गया है, जो इस पर्व की महिमा को और बढ़ाता है।