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Tulsi Vivah Puja Vidhi: घर पर कैसे करें तुलसी विवाह, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और कथा
Fri, 08 Nov 2019 08:10 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Fri, 08 Nov 2019 08:10 AM IST
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वृंदा के घर के आंगन की तुलसी बनने की पूरी कहानी
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हिंदू धर्म में तुलसी विवाह हर साल कार्तिक महीने की देवउठनी एकादशी पर मनाई जाती है। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा के बाद जागते हैं। इसके बाद सभी तरह के शुभ कार्य आरंभ हो जाते हैं। तुलसी विवाह में माता तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम के साथ किया जाता है। जो भी व्यक्ति तुलसी विवाह का अनुष्ठान करता है उसे कन्यादान के बराबर का पुण्य मिलता है। आइए जानते हैं तुलसी विवाह कैसे संपन्न किया जाता है। क्या है इसकी पूरी विधि और पूजा का समय....
तुलसी विवाह की पूजन विधि
- तुलसी के पौधे का गमले को गेरु और फूलो से सजाएं।
- तुलसी के पौधे के चारों ओर गन्ने का मंडप बनाएं।
- तुलसी के पौधे के ऊपर लाल चुनरी चढ़ाएं।
- तुलसी को चूड़ी और श्रृंगार के अन्य सामग्रियां अर्पति करें।
- श्री गणेश जी पूजा और शालिग्राम का विधिवत पूजन करें।
- भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं।
- आरती के बाद विवाह में गाए जाने वाले मंगलगीत के साथ विवाहोत्सव पूर्ण किया जाता है।
तुलसी पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त
शाम 7.50 से 9.20 के बीच में तुलसी पूजन करना चाहिए।
तुलसी पूजन की सामग्री
गन्ना, विवाह मंडप की सामग्री, सुहागन सामग्री, घी, दीपक, धूप, सिन्दूर , चंदन, नैवद्य और पुष्प आदि।
तुलसी विवाह कथा
भगवान विष्णु की सबसे प्रिय तुलसी का विवाह भी भगवान शालीग्राम से होता है। तुलसी का एक नाम वृंदा भी है। आइए जानते हैं वृंदा के हमारे आपके घर के आंगन की तुलसी बनने की पूरी कहानी।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राक्षस कुल में एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम वृंदा था। वह बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्ति और साधना में डूबी रहती थीं। जब वृंदा विवाह योग्य हुईं तो उसके माता-पिता ने उसका विवाह समुद्र मंथन से पैदा हुए जलंधर नाम के राक्षस से कर दिया। वृंदा भगवान विष्णु की भक्त के साथ एक पतिव्रता स्त्री थी जिसके कारण उनके पति जलंधर समय के साथ और भी शक्तिशाली हो गया। सभी देवी-देवता जलंधर के कहर से डरने लगे।
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जलंधर जब भी युद्ध पर जाता वृंदा पूजा अनुष्ठान करने बैठ जाती। वृंदा की विष्णु की भक्ति और साधना के कारण जलंधर को कोई भी युद्ध में हरा नहीं पाता था। एक बार जलंधर ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी जिसके बाद सारे देवता जलंधर को परास्त करने में असमर्थ हो रहे थे। तब हताश होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को खत्म का उपाय पर विचार करने लगे।
भगवान विष्णु ने किया छल
तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति कम होती गई और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को शिला यानी पत्थर बन जाने का शाप दे दिया। भगवान को पत्थर का होते देख सभी देवी-देवता में हाकाकार मच गया फिर माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की तब जाकर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया और खुद जलांधर के साथ सती हो गई।
जब वह उसके साथ भस्म हो गईं, तो कहते हैं कि उनके शरीर की भस्म से तुलसी का पौधा बना। फिर उनकी राख से एक पौधा निकला जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया और खुद के एक रूप को पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं कोई भी प्रसाद स्वीकार नहीं करूंगा। इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा। तभी से कार्तिक महीने में तुलसी जी का शालिग्राम के साथ विवाह भी किया जाता है।
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तुलसी विवाह की पूजन विधि
- तुलसी के पौधे का गमले को गेरु और फूलो से सजाएं।
- तुलसी के पौधे के चारों ओर गन्ने का मंडप बनाएं।
- तुलसी के पौधे के ऊपर लाल चुनरी चढ़ाएं।
- तुलसी को चूड़ी और श्रृंगार के अन्य सामग्रियां अर्पति करें।
- श्री गणेश जी पूजा और शालिग्राम का विधिवत पूजन करें।
- भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं।
- आरती के बाद विवाह में गाए जाने वाले मंगलगीत के साथ विवाहोत्सव पूर्ण किया जाता है।
तुलसी पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त
शाम 7.50 से 9.20 के बीच में तुलसी पूजन करना चाहिए।
तुलसी पूजन की सामग्री
गन्ना, विवाह मंडप की सामग्री, सुहागन सामग्री, घी, दीपक, धूप, सिन्दूर , चंदन, नैवद्य और पुष्प आदि।
तुलसी विवाह कथा
भगवान विष्णु की सबसे प्रिय तुलसी का विवाह भी भगवान शालीग्राम से होता है। तुलसी का एक नाम वृंदा भी है। आइए जानते हैं वृंदा के हमारे आपके घर के आंगन की तुलसी बनने की पूरी कहानी।
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पौराणिक मान्यता के अनुसार, राक्षस कुल में एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम वृंदा था। वह बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्ति और साधना में डूबी रहती थीं। जब वृंदा विवाह योग्य हुईं तो उसके माता-पिता ने उसका विवाह समुद्र मंथन से पैदा हुए जलंधर नाम के राक्षस से कर दिया। वृंदा भगवान विष्णु की भक्त के साथ एक पतिव्रता स्त्री थी जिसके कारण उनके पति जलंधर समय के साथ और भी शक्तिशाली हो गया। सभी देवी-देवता जलंधर के कहर से डरने लगे।
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जलंधर जब भी युद्ध पर जाता वृंदा पूजा अनुष्ठान करने बैठ जाती। वृंदा की विष्णु की भक्ति और साधना के कारण जलंधर को कोई भी युद्ध में हरा नहीं पाता था। एक बार जलंधर ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी जिसके बाद सारे देवता जलंधर को परास्त करने में असमर्थ हो रहे थे। तब हताश होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को खत्म का उपाय पर विचार करने लगे।
भगवान विष्णु ने किया छल
तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति कम होती गई और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को शिला यानी पत्थर बन जाने का शाप दे दिया। भगवान को पत्थर का होते देख सभी देवी-देवता में हाकाकार मच गया फिर माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की तब जाकर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया और खुद जलांधर के साथ सती हो गई।
जब वह उसके साथ भस्म हो गईं, तो कहते हैं कि उनके शरीर की भस्म से तुलसी का पौधा बना। फिर उनकी राख से एक पौधा निकला जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया और खुद के एक रूप को पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं कोई भी प्रसाद स्वीकार नहीं करूंगा। इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा। तभी से कार्तिक महीने में तुलसी जी का शालिग्राम के साथ विवाह भी किया जाता है।