Apara Ekadashi Vrat : सिर्फ पापों से ही नहीं प्रेत बाधा से भी मुक्ति दिलाता है अपरा एकादशी का व्रत
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पाप संग प्रेत बाधा से दिलाता है मुक्ति
भगवान विष्णु की कृपा दिलाने वाले व्रत की महिमा का पुराणों में भी वर्णन मिलता है। पद्मपुराण के अनुसार अपरा एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को प्रेत योनि में जाकर कष्ट नहीं भोगना पड़ता है। प्रेत योनि से मुक्ति प्रदान करने वाली इस एकादशी का नाम अचला है।
अपरा एकादशी व्रत की कथा
प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। जिनका छोटा भाई वज्रध्वज पापी और अधर्मी था। इसने एक एक रात अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी। इसके बाद महीध्वज के मृत शरीर को जंगल में ले जाकर पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण धर्मात्मा राजा को भी प्रेत यानि में जाना पड़ा। राजा प्रेत रूप में पीपल पर रहने लगा और उस रास्ते से आने जाने वालों को परेशान करने लगा।
एक दिन सौभाग्य से उस रास्ते से धौम्य नामक ॠषि गुजरे। ऋषि ने जब प्रेत को देखा तो अपने तपोबल से सब हाल जान लिया। ॠषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने का विचार किया और प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। संयोग से उस समय ज्येष्ठ मास की एकादशी तिथि भी थी। ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत किया और एकादशी के पुण्य को राजा को अर्पित कर दिया। इस पुण्य से राजा प्रेत योनि से मुक्त हो गया और दिव्य देह धारण करके स्वर्ग चला गया।
जून
13 जून — निर्जला एकादशी
29 जून — योगिनी एकादशी
जुलाई
12 जुलाई — देवशयनी एकादशी
28 जुलाई — कामदा एकादशी
अगस्त
11 अगस्त — पवित्रा एकादशी
26 अगस्त — अजा एकादशी
सितंबर
09 सितंबर — पद्मा एकादशी
25 सितंबर — इंदिरा एकादशी
अक्टूबर
09 अक्टूबर — पापकुशा एकादशी
24 अक्टूबर — रमा एकादशी
नवंबर
08 नवंबर — देवप्रबोधिनी एकादशी
22 नवंबर — उत्पत्ति एकादशी
दिसंबर
08 दिसंबर — मोक्षदा एकादशी
22 दिसंबर — सफला एकादशी