मकर संक्रांति 15 जनवरी को है। धार्मिक रूप से यह बेहद पवित्र पर्व है। इस दिन सूर्य का दक्षिणायन से उत्तरायण होना अति शुभ माना जाता है। इस दिन स्नान, दान-पुण्य तो किया ही जाता है। साथ ही इस दिन विशेष रूप से खिचड़ी भी खाई जाती है। आइए, जानते हैं क्यों...
मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी दान और खाने की परंपरा के पीछे भगवान शिव के अवतार कहे जाने वाले बाबा गोरखनाथ की कहानी है। खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे।
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मकर संक्रांति 2018
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इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था। इससे शरीर को तुरंत उर्जा मिलती थी। नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा।
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खिचड़ी
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गोरखपुर स्थिति बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे भी प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है। खिचड़ी दान और भोजन के पीछे एक दूसरा कारण यह है कि संक्रांति के समय नया चावल तैयार हो जाता है। माना जाता है कि सूर्य देव ही सभी अन्न को पकाते हैं और उन्हें पोषित करते हैं इसलिए आभार व्यक्त करने के लिए सूर्य देव को गुड़ से बनी खीर या खिचड़ी अर्पित करते हैं।
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खिचड़ी
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वैसे मकर संक्रांति के दिन बनाई जाने वाली खिचड़ी में उड़द का दाल प्रयोग किया जाता है जो शनि से संबंधित है। कहते हैं इस दिन विशेष खिचड़ी को खाने से शनि का कोप दूर होता है। इसलिए खिचड़ी खाने की परंपरा है। वैज्ञानिक नजरिए से मकर संक्रांति पर खिचड़ी का सेवन करना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना गया है। दरअसल सर्दियों के मौसम में शरीर का तापमान गिर जाता है। तिल और गुड़ खाने से शरीर गर्म रहता है।