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Lohri 2022 Date: कब है लोहड़ी का त्योहार, जानिए क्यों मनाई जाती है लोहड़ी और क्या है परंपरा ?

Thu, 06 Jan 2022 07:51 AM IST
विनोद शुक्ला मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषविद्, चंडीगढ़
मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषविद्, चंडीगढ़ Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 06 Jan 2022 07:51 AM IST
सार

Lohri 2022 Date: आयुर्वेद के दृष्टिकोण से जब तिल युक्त आग जलती है, वातावरण में बहुत सा संक्रमण समाप्त हो जाता है और परिक्रमा करने से शरीर में गति आती है। गांवों मे आज भी लोहड़ी के समय सरसों का साग, मक्की की रोटी अतिथियों को परोस कर उनका स्वागत किया जाता है।

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lohri 2022 know when and why lohri is celebrated
लोहड़ी पर्व - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Happy Lohri 2022 : लोहड़ी परंपरागत रूप से रबी फसलों की फसल से जुड़ा हुआ है और यह किसान परिवारों में सबसे बड़ा उत्सव भी है। पंजाबी किसान लोहड़ी के बाद भी वित्तीय नए साल के रूप में देखते हैं। कुछ का मानना है कि लोहड़ी ने अपना नाम लिया है, कबीर की पत्नी लोई, ग्रामीण पंजाब में लोहड़ी लोही है। मुख्यतः पंजाब का पर्व होने से इसके नाम के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं। ल का अर्थ लकड़ी है, ओह का अर्थ गोहा यानी उपले, और ड़ी का मतलब रेवड़ी। तीनों अर्थों को मिला कर लोहड़ी बना है।

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अग्नि प्रज्जवलन का शुभ मुहूर्त
गुरुवार की सायंकाल 5 बजे से रोहिणी नक्षत्र आरंभ हो जाएगा। लकड़ियां, समिधा, रेवड़ियां, तिल आदि सहित अग्नि प्रदीप्त करके अग्नि पूजन के रुप में लोहड़ी का पर्व मनाएं रात्रि तक। संपूर्ण भारत में लोहड़ी का पर्व धार्मिक आस्था, ऋतु परिवर्तन, कृषि उत्पादन, सामाजिक औचित्य से जुड़ा है। पंजाब में यह कृषि में रबी फसल से संबंधित है, मौसम परिवर्तन का सूचक तथा आपसी सौहार्द्र का परिचायक है।
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कैसे मनाई जाती है लोहड़ी
सायंकाल लोहड़ी जलाने का अर्थ है कि अगले दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश पर उसका स्वागत करना। सामूहिक रूप से आग जलाकर सर्दी भगाना और मूंगफली, तिल, गज्जक, रेवड़ी खाकर शरीर को सर्दी के मौसम में अधिक समर्थ बनाना ही लोहड़ी मनाने का उद्देश्य है। आधुनिक समाज में लोहड़ी उन परिवारों को सड़क पर आने को मजबूर करती है जिनके दर्शन पूरे वर्ष नहीं होते। रेवड़ी मूंगफली का आदान प्रदान किया जाता है। इस तरह सामाजिक मेल जोल में इस त्योहार का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अलावा कृषक समाज में नववर्ष भी आरंभ हो रहा है। परिवार में गत वर्ष नए शिशु के आगमन या विवाह के बाद पहली लोहड़ी पर जश्न मनाने का भी यह अवसर है। दुल्ला भटटी की सांस्कृतिक धरोहर को संजो रखने का मौका है। 
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आयुर्वेद के दृष्टिकोण से जब तिल युक्त आग जलती है, वातावरण में बहुत सा संक्रमण समाप्त हो जाता है और परिक्रमा करने से शरीर में गति आती है। गांवों मे आज भी लोहड़ी के समय सरसों का साग, मक्की की रोटी अतिथियों को परोस कर उनका स्वागत किया जाता है।


लोहड़ी और दुल्ला भट्टी की कथा
किंवदंतियों के अनुसार लोहड़ी की उत्पत्ति दुल्ला भट्टी से संबंधित है। जिसे पंजाब के "रॉबिन हुड" के रूप में जाना जाता है। वह अमीर से लूट गया और इसे गरीबों के बीच वितरित किया। उन्होंने कई हिंदू पंजाबी लड़कियों को भी बचाया जिन्हें जबरन बाजार में बेचने के लिए लिया जा रहा था। हिंदू अनुष्ठानों के अनुसार और उन्हें दहेज प्रदान किया लाहौर में उनके सार्वजनिक निष्पादन के बाद अपने उद्धारकर्ता की याद में लड़कियों ने गाने गाए और बोनफायर के आसपास नृत्य किया। यह उस दिन से पंजाब की परंपरा थी और हर साल पंजाब में लोहड़ी के रूप में गर्व से मनाया जाता था। तो हर लोहड़ी गीतों में दुल्ला भट्टी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।

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