दिवाली पर इस सरल विधि से करें मां लक्ष्मी की पूजा, भरा रहेगा धन का भंडार
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संसार में लौकिक-पारलौकिक रूप से मिलने वाले दैहिक, दैविक और भौतिक त्रिबिध महाकष्टों के अधिपति रूद्र, यम, वरुण और निर्र्ति ये चार देवता है। संसार में जितने भी रोग, महामारी, अकाल, सूखा, बाढ़ आदि महाविनाशक रोग और दुःख होते हैं, सब के स्वामी यही चार देवता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक जब भगवन विष्णु जी शयन करते हैं, तो देवप्राण कमजोर पड़ जाते हैं और आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है। किन्तु महालय के बाद शक्ति आराधना के पर्व नवरात्र से देवप्राण प्रबल होने लगते हैं और कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी से इन चार देवताओं का प्रभाव बिलकुल कम हो जाता है।
इस बेला में करें लक्ष्मी पूजन
इस चतुर्दशी को दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी का प्रभाव क्षीण हो जाता है और अगले ही दिन अमावस्या को माता महालक्ष्मी जी आगमन होता है। सभी लोकों के वासी अष्टलक्ष्मी सहित माता महालक्ष्मी जी की आराधना श्रद्धा-विश्वास के साथ करते हुए रात्रि जागरण करते हैं। इस दिन प्रदोष वेला से लेकर पिशाच वेला के आरम्भ से पहले तक ही लक्ष्मी पूजा का विधान है। यह पिशाच वेला रात्रि 02 बजे से आरम्भ होती है। इस लिए इसदिन लक्ष्मी पूजा वर्ष के सभी दिनों से सर्वश्रेष्ठ मानी गयी है। आप की सुगमता के लिए लक्ष्मी पूजा की सरल बिधि दी जा रही है।
नई मूर्ति या नए चित्र का ही करें पूजन
दीपावली के दिन प्रदोष वेला, स्थानीय सूर्यास्त से 72 मिनट पहले और 72 मिनट बाद तक की वेला प्रदोष वेला मानी गयी है। इस दिन स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्राभूषण धारण करके घर के पूजास्थल पर यथाशक्ति पूजन सामग्री लेकर बैठें ,साथ ही गणेश सहित महालक्ष्मी वरुण, कुबेर, श्रीयंत्र, कुबेरयंत्र और नवग्रह यन्त्र लें। ध्यान रहे दीपावली पूजन में लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्तियां अथवा चित्र बिलकुल नया होना चाहिए। कहने का तात्पर्य पहले उन मूर्तियों का प्रयोग पूजा में न किया गया हो। आप इस बात का ध्यान रखें की पूजा में श्रद्धा का नैवेद्य ही चढ़ाएं। भाव और भक्ति की कमी न रहने पाए तभी माता आप से प्रसन्न होंगी।
इस मंगल मंत्र के साथ करें शुभ संकल्प
पूजा में कमल पुष्प और आंवले का प्रयोग भी हो जाये जाए तो और उत्तम रहेगा। इसके अतिरिक्त गुड़हल, लाल कनेर, गेंदा आदि से भी मां की आराधना कर सकते हैं। साथ ही सिंदूर श्रृंगार का सामान हल्दी रोली, मोली, लाल चन्दन, अक्षत, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, शहद, फल, मिष्ठान, गंगाजल, नारियल, कलश अथवा जो भी यथा समय उपलब्ध हो उसे साथ लेकर बैठें। अपने ऊपर जल छिड़कते हुए भगवान् ॐ पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करके अपने ऊपर जल छिड़कें। सभी सामग्रियों पर भी गंगाजल छिडकें। पृथ्वी स्पर्श करते हुए ॐ भूम्यै नमः कहें। पूजा स्थल के दक्षिण-पूर्व के तरफ घी का दीप जलाते हुए ॐ दीपोज्योतिः परब्रह्म दीपोज्योतिः जनार्दनः। दीपो हरतु में पापं पूजा दीपं नमोस्तुते। जो मंगल मंत्र आता हो उसे पढ़ें और स्वयं संकल्प करें। जो भी आप की भावना हो व्यथा हो गणेश जी और माता जी से कहें।
इस महामंत्र से मिलेगी मां लक्ष्मी की कृपा
एकोहं बहुस्यामः अर्थात जगत में एक केवल "मां" ही परम सत्य हैं, जो बिविध रूपों में विचरती है। अतः आप उनके एक ही मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। और "या देवि। सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै। नमस्तस्यै। नमस्तस्यै नमो नमः।। मंत्र को पढ़ते हुए सभी पूजन सामग्री अर्पण कर सकते हैं। इन्हीं दोनों मन्त्रों से आप विधिवत पूजन करसकते हैं। पूजन के पश्चात् चारमुखी दीपक रात्रि भर जलाएं। विद्यार्थी वर्ग इस दिन माता महासरस्वती का मंत्र "या देवि सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै। नमस्तस्यै। नमस्तस्यै नमो नमः।। का जप करके शिक्षा प्रतियोगिता में बड़ी सफलता अर्जित कर सकते हैं।