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धूमावती जयंती 2020: देवी ने अपने पति को ही क्यों निगला था? जानिए कथा

Wed, 27 May 2020 10:45 AM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री
पं जयगोविंद शास्त्री Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 27 May 2020 10:45 AM IST
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dhumavati jayanti 2020 know story of doomvati
भगवान शिव द्वारा प्रकट की गई दस महाविद्याओं में सातवें स्थान पर पुरुषशून्या विधवा आदि नामों से जानी जाने वाली माँ धूमावती का नाम आता है।
भगवान शिव द्वारा प्रकट की गई दस महाविद्याओं में सातवें स्थान पर पुरुषशून्या विधवा आदि नामों से जानी जाने वाली माँ धूमावती का नाम आता है। इनका प्राकट्य ज्येष्ठ शुक्लपक्ष अष्टमी को हुआ। विधवा, भिक्षाटन, दरिद्रता, भूकंप, सूखा, बाढ़, प्यास रुदन, वैधव्य, पुत्रसंताप, कलह इनकी साक्षात प्रतिमाएं हैं। डरावनी शक्ल, रुक्षता, अपंग शरीर जिनके दंड का फल है इन सब की मूल प्रकृति में पराम्बा धूमावती ही हैं। इनका निवास ज्येष्ठा 'नक्षत्र' है। इसीलिए इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक जीवन पर्यन्त स्वास्थ्य अथवा किसी न किसी प्रकार के संघर्षों से लड़ता रहता है। इन्हें ही अलक्ष्मी नाम से भी जाना जाता है। इनकी पूजा-आराधना से उपरोक्त सभी प्राणियों के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।
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माँ पार्वती बनी धूमावती
पौराणिक कथा है, कि एक बार भगवान शिव-पार्वती कैलाश पर विचरण करते हुए विश्राम हेतु कुछ समय के लिए एक स्थान पर बैठ गए। कुछ देर बाद पार्वती को भूख सताने लगी, उन्होंने शिव से क्षुधापूर्ति की याचना की। शिव ने कहा प्रिये ! मैं शीघ्र ही भोजन की व्यवस्था करता हूँ। काफी देर हो गई किन्तु भोजन की व्यवस्था नहीं हो पायी और माँ पार्वती से भूख बर्दास्त नहीं हुई, तब स्वयं भगवती ने शिव को ही निगल लिया, जिससे उनके शरीर से धुआं निकलने लगा। शिव जी अपनी माया से बाहर आकर पार्वती से कहा, मैं एक पुरूष हूँ और तुम एक स्त्री हो, तुमने अपने पति को ही निगल लिया, अतः अब तुम विधवा हो गई हो इस कारण तुम सौभाग्यवती के श्रृंगार को छोड़कर वैधव्य वेष में रहो और संसार में 'धूमावती' नाम से विख्यात होगी। त्रिवर्णा, विरलदंता, चंचला, विधवा, मुक्तकेशी, शूर्पहस्ता, कलहप्रिया, काकध्वजिनी आदि तुम्हारे और भी सहस्त्रों नाम होंगे। तुम्हारी कृपा से प्राणी धर्म, अर्थ काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्राप्त कर लेगा।
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माँ धूमावती सरल की पूजा-
गृहस्थ पुरुष को माँ का यह मंत्र 'ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा' रुद्राक्ष की माला से जपते हुए माँ के सौम्यरूप की पूजा करनी चाहिए। इन्हीं मन्त्रों द्वारा राई में नमक मिलाकर होम करने से शत्रुनाश, नीम की पत्तियों सहित घी का होम करने से कर्ज से मुक्ति मिलजाती जाती है। काली मिर्च से होम करने से कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय एवं कारागार से मुक्ति मिलती है। जटामांसी और कालीमिर्च से होम करने पर जन्मकुंडली के सभी अकारक, गोचर एवं मारक दशाओं के ग्रहदोष नष्ट हो जाते हैं। माँ का सर्वोत्तम भोग मीठी रोटी और घी के द्वारा होम करने से से प्राणियों के जीवन आया घोर से घोर संकट भी समाप्त हों जाता है। माँ की पूजा के लिए सफेद रंग के फूल, आक के फूल, सफेद वस्त्र, केसर, अक्षत, घी, सफेद तिल, धतूरा, आक, जौ, सुपारी दूर्वा, गंगाजल, शहद, कपूर, चन्दन, नारियल पंचमेवा आदि ही प्रयोग में लायें।
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