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देवशयनी एकादशी: सभी दुखों को दूर करने वाली हरिशयनी एकादशी आज
Wed, 01 Jul 2020 11:01 AM IST
विनोद शुक्ला
पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य
पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 01 Jul 2020 11:01 AM IST
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आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शयन आरम्भ करते हुए भगवान श्रीहरि कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं
जगत गुरु भगवान नारायण की परमप्रिय हरिशयनी एकादशी 1 जुलाई बुधवार को है। इसीदिन भगवान श्रीहरि शयन करना आरम्भ करते हैं। इसी के साथ संसार के सभी अति आवश्यक कार्यों को छोड़कर सभी मांगलिक शुभ कार्य जैसे शादी-विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत आदि होने बंद हो जाते हैं किन्तु स्थान भेद से ये कई क्षेत्रों में ये कार्य अशुद्ध मुहूर्त के नाम से चलते रहते हैं । इसी दिन से परिव्राजक, साधू-सन्यासी आदि सभी लोंगों का चातुर्मास्य व्रत आरम्भ हो जाता हैं ।आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शयन आरम्भ करते हुए भगवान श्रीहरि कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं जिसे हरिप्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है इस वर्ष ये तिथि 25 नवंबर को पड़ रही है।
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अपने शयनकाल की अवधि के मध्य भगवान श्रीविष्णु भादों शुक्ल एकदशी को करवट बदलते हैं। इस एकादशी का व्रत चारो पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है। एकादशी के महत्व को बताते हुए शास्त्र कहते हैं, कि
"नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरु: ! नास्ति विष्णुसमं देवं तपो नानशनात्परम !!
नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्ति समं धनं ।नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्मसमः पिता ।न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्याः परं व्रतं" !!
अर्थात गंगा के सामान कोई तीर्थ नहीं है। माता के सामान कोई गुरु नहीं है। भगवान् विष्णु के सामान कोई देवता नहीं है। उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है । माता के सामान कोई क्षमाशील नहीं है। कीर्ति के सामान कोई धन नहीं है। ज्ञान के सामान कोई लाभ नहीं है। धर्म के सामान कोई पिता नहीं है। विवेक के सामान कोई बंधु नहीं हैऔर एकादशी से बढ़कर कोई व्रत नहीं है।
"नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरु: ! नास्ति विष्णुसमं देवं तपो नानशनात्परम !!
नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्ति समं धनं ।नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्मसमः पिता ।न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्याः परं व्रतं" !!
अर्थात गंगा के सामान कोई तीर्थ नहीं है। माता के सामान कोई गुरु नहीं है। भगवान् विष्णु के सामान कोई देवता नहीं है। उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है । माता के सामान कोई क्षमाशील नहीं है। कीर्ति के सामान कोई धन नहीं है। ज्ञान के सामान कोई लाभ नहीं है। धर्म के सामान कोई पिता नहीं है। विवेक के सामान कोई बंधु नहीं हैऔर एकादशी से बढ़कर कोई व्रत नहीं है।
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इस दिन भगवान नारायण कि मूर्ति जिसमें चारों भुजाएं जिसमे शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हो, उस प्रतिमा को पीले वस्त्र धारण कराकर मूर्ति के आकार के सुंदर पलंग पर लेटाकर पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराकर षोडशोपचार विधि से पूजन करना चाहिए। उसके बाद श्रीहरि की प्रार्थना इस प्रकार करे कि, सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तम भावेदिदम !विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम !!
हे ! जगन्नाथ आप के सो जाने पर यह संपूर्ण जगत सो जाता है, और आप के जागृत होने यह संपूर्ण चराचर जगत भी जागृत रहता है। इस प्रकार निवेदन करते हुए प्रणाम करें। एकादशी के दिन व्रती को झूठ बोलने, ठगी करने, दूसरे का अहित सोचने तथा बड़ों का अपमान करने से बचते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस प्रकार मानव हरिशयनी एकादशी के दिन भगवान् श्रीविष्णु की पूजा करके दैहिक ,दैविक और भौतिक यानी तीनो तापों से मुक्ति पाता है । शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से जीवन मरण के बंधन से मुक्त होकर स्वयं नारायण में ही विलीन हो जाता है।