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अजा एकादशी, इस व्रत को करने पर राजा हरिश्चन्द्र को मिला था दोबारा राज-पाठ

Thu, 06 Sep 2018 09:19 AM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 06 Sep 2018 09:19 AM IST
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aja ekadashi 2018 vrat katha and importance

भाद्रपद की कृष्णपक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते है। इस बार यह एकादशी 6 सितंबर गुरुवार के दिन है। हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से हर महीने 2 एकादशियां आती हैं। हर एकादशी का अपना अलग महत्व होता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का महत्व विशेष होता है। इस एकादशी के बारे में ऐसी मान्यता है कि राजा हरिश्चन्द को अपना खोया हुआ परिवार और राज-पाठ वापस मिल गया था। आइए जानते हैं कि अजा एकादशी की व्रत कथा।

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भगवान राम के वंश में हरिश्चन्द्र नाम के एक राजा हुए थे। राजा अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। जिसके तहत राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना सम्पूर्ण राजपाट दान कर दिया है। जब अगले दिन राजा हरिश्चन्द्र विश्वामित्र को अपना समस्त राज-पाठ सौंप कर जाने लगे तभी विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से दक्षिणा स्वरुप 500 स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। राजा ने उनसे कहा कि पांच सौ क्या, आप जितनी चाहे स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिए। इस पर विश्वामित्र हंसने लगे और राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं किया जाता।
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तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल की, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दी। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को जहां बेचा था वह श्मशान का चांडाल था। चांडाल ने राजा हरिश्चन्द्र को श्मशान भूमि में दाह संस्कार के लिए कर वसूली का काम दे दिया। 
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एक दिन राजा हरिश्चंद्र ने एकादशी का व्रत रखा हुआ था। आधी रात का समय था और राजा श्मशान के द्वार पर पहरा दे रहे थे। बेहद अंधेरा था, इतने में ही वहां एक लाचार और निर्धन स्त्री बिलखते हुए पहुंची जिसके हाथ में अपने पुत्र का शव था।राजा हरिश्चन्द्र ने सत्यधर्म का पालन करते हुए पत्नी से भी पुत्र के दाह संस्कार के लिए भी कर मांगा। पत्नी के पास कर चुकाने के लिए धन नहीं था इसलिए उसने अपनी सारी का आधा हिस्सा फाड़कर राजा का दे दिया।


उसी समय भगवान प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है, तुम इतिहास में अमर रहोगे। इतने में ही राजा का बेटा रोहिताश्व जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने भी हरिश्चंद्र का राजपाठ उन्हें वापस लौटा दिया।

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