हिमाचल विस चुनाव: कांगड़ा के सियासी दुर्ग से निकलेगी सत्ता की राह

अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, कांगड़ा Updated Wed, 08 Nov 2017 01:55 PM IST
himachal assembly election 2017 kangra distt importance
विधानसभा चुनाव में एक जुमला खूब चला कि शिमला की सत्ता पर काबिज होने का रास्ता कांगड़ा से होकर गुजरता है। प्रदेश के सियासी समीकरणों के लिहाज से यह काफी हद तक सही है। इस बार 15 सीटों वाले इस जिले के इर्द-गिर्द ही चुनावी धुरी घूम रही है। प्रदेश के सबसे बड़े जिले में दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस के अलावा कई धुरंधरों की साख भी दांव पर है।

भाजपा ने यहां मोदी फैक्टर को प्रभावी बनाने के लिए प्रधानमंत्री की तीन रैलियां करवाईं तो कांग्रेस में वीरभद्र सिंह कांगड़ा के मोर्चे पर डटे रहे। हालांकि, नगरोटा बगवां समेत कुछ सीटों से वीरभद्र के दूरी बनने पर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उसकी भरपाई करने की कोशिश की है।

कांगड़ा की हर सीट का अपना गणित है। कहीं ओबीसी फैक्टर, कहीं गद्दी वोट बैंक तो कहीं दूसरे जातीय समीकरण हावी हैं। मोदी ने वजीर राम सिंह पठानिया के नाम से अपने दौरे की जिस तरह शुरुआत की, उससे लगा कि कांगड़ा जाति समुदाय विशेष की राजनीति में उलझ कर रह जाएगा। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं। प्रधानमंत्री ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए शांता-धूमल की जोड़ी को विकास पुरुषों के तौर पर पेश किया। 

उधर, कांग्रेस ने पांच वर्षों में किए विकास कार्यों को आगे रखकर कांगड़ा से सियासी दुर्ग को बचाने की रणनीति अपनाई। वर्ष 2012 में दस सीटें जीत चुकी कांग्रेस के इस बार भी कई सीटों पर गणित भाजपा में हुई बगावत से बनते दिख रहे, लेकिन जहां बगावत नहीं है, वहां कांटे की टक्कर है। करारी हार से सबक लेकर भगवा ब्रिगेड ने शाह की रणनीति को परवान चढ़ाने की कोशिश की है।

शाह ने मई में कांगड़ा से सियासी शंखनाद फूंका, जिसके बाद पीएम मोदी सहित राजनाथ, स्मृति ईरानी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ समेत कई केंद्रीय नेता उतारे गए। अब प्रचार का शोर थम गया है। कांगड़ा के वोटर के मन थाह भांपने में दोनों ओर से दी दलीलें और अपीलें कितना कामयाब रहीं, यह नतीजे तय करेंगे। अब देखना ये है कि भाजपा के डबल इंजन की थ्योरी के जवाब में कांग्रेस का विकास मॉडल कितना कारगर साबित होता है।

सीटों के समीकरण 
पालमपुर -
त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस के आशीष के सामने इंदु हैं। इंदु की सफलता इस पर टिकी है कि वे बाहरी का लगा टैग हटा कि नहीं, शांता खेमे से कितना समर्थन मिला और मोदी कैंडिडेट की छाप कारगर हुई या नहीं। आशीष पिता की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने के साथ खुद की छवि के भरोसे हैं। उन्हें न बगावत से जूझना पड़ रहा है न ही बाहरी भीतरी का जुमला उन पर लागू है। प्रवीण शर्मा की परीक्षा ये है कि वे भाजपा के बिना खुद के वजूद को कितना बड़ा कर पाए हैं। उनकी राजनीति भविष्य चुनाव से जुड़ गया है। सीट पर वाम दल के बिट्टू और निर्दलीय बेनी प्रसाद के समीकरण भी मुकाबले को रोचक बना रहे हैं।

बैजनाथ - यहां मुकाबले में कोई कोण नहीं है। सीधा भाजपा-कांग्रेस के बीच का संघर्ष है। कांग्रेस के सिटिंग विधायक किशोरी लाल के सामने पुराने भाजपा प्रत्याशी मुल्खराज ही हैं। मुल्खराज के लिए कई केंद्रीय नेताओं ने यहां आकर प्रचार किया। मोदी की पालमपुर रैली से उनको आस है, लेकिन किशोरी किसी भी सियासी पैमाने में कम नहीं हैं। वीरभद्र की गुड बुक में होने के साथ उन्होंने पांच वर्ष की एंटी इंकंबेंसी को बखूबी संभाला है। अन्य दलीय या निर्दलीय कोई खास कारगर नहीं दिख रहे।।

जयसिंहपुर - आरक्षित सीट पर आमने-सामने की लड़ाई है। कांग्रेस के सिटिंग विधायक यादवेंद्र गोमा के सामने भाजपा ने नए चेहरे के तौर पर रविंद्र धीमान को टिकट दिया। रविंद्र यहां के लोगों के लिए नए नहीं हैं और अब तो वे अपने नाम के साथ रवि भी लगा चुके हैं। रवि ने पिछले चुनाव में बतौर निर्दलीय अपनी मौजूदगी दर्ज करवा दी थी, जबकि गोमा दूसरी पारी के लिए जनता के बीच हैं। इस क्षेत्र का पिछड़ापन चुनावों में बड़ा मुद्दा बना है। गोमा पंचरुखी से हैं तो धीमान जांगल से हैं, ये दोनों जगह हलके के दो छोर हैं, जहां दोनों ओर के जातीय समीकरण नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

सुलह - हलके में एक बार फिर पुराने धुरंधरों के बीच टक्कर है। कांग्रेस के सिटिंग विधायक जगजीवन पाल वीरभद्र के करीबी हैं। इस बार सीपीएस तो सरकार आने पर मंत्री के दावेदार होने को लेकर उनका प्रचार है। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष विपिन परमार छात्र राजनीति से पार्टी के साथ जुड़े हैं। यहां हुए प्रचार में विपिन को सरकार बनने पर मंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया गया। जातीय समीकरणों में उलटफेर के माहिर पाल के लिए इस बार चुनौती कम नहीं है। यहां कांटे का मुकाबला है और नतीजा बेहद करीबी रहेगा इसकी संभावना जनता भी जता रही है।

नगरोटा बगवां - विधानसभा क्षेत्र में दो दशकों से जीएस बाली जीत का परचम लहरा रहे हैं। ओबीसी बहुल सीट पर बाली के दबदबे को पहली बार उनका एक जमाने का करीबी अरुण कुमार कूका चुनौती दे रहा है। कांग्रेस के बाली और भाजपा के कूका से अधिक यह चुनावी टक्कर दोनों के बीच निजी जंग की तरह देखी जा रही है। बाली ने हर वो दांव प्रचार में खेला, जिसके वे माहिर हैं। वीरभद्र नहीं आए तो राहुल आ गए। उधर, कूका भाजपा कैडर के समर्थक के साथ अपने निजी कैडर के भरोसे आगे बढ़ रहे हैं। शहर, पलम और चंगर तीन हिस्सों में बंटी विधानसभा में कूका और बाली का पलड़ा बराबर है। यहां कहा जाता है कि प्रचार खत्म होने के बाद डोर टू डोर का फार्मूला जीत-हार तय करता है।

कांगड़ा - ओबीसी बहुल इस सीट पर निर्दलीय से कांग्रेस में शामिल हुए विधायक पवन काजल के सामने भाजपा के संजय चौधरी हैं। यहां भाजपा कांग्रेस के साथ थोड़ा सा असर बाली फैक्टर का भी है। काजल को वीरभद्र सिंह के दौरों से उम्मीद है, जबकि संजय ने पार्टी कैडर में बगावत को कितना साधा है, इसपर काफी कुछ निर्भर करता है। संजय की टिकट से नाराज उत्तम चौधरी अब साथ दिख रहे हैं। इस सीट पर तीसरा कोण निर्दलीय डॉ. राजेश शर्मा का है। यहां एक से ज्यादा बार किसी विधायक को जनता तवज्जो नहीं देती और कई बार निर्दलीय यहां करिश्मा कर चुके हैं।

धर्मशाला - यहां कैबिनेट मंत्री सुधीर शर्मा की टक्कर भाजपा प्रत्याशी किशन कपूर है। कपूर ने टिकट मिलने से पहले बगावत का झंडा उठा लिया था, पर उन्हें टिकट मिल गया। शांता के करीबी कपूर के लिए यह पुरानी सीट है, लेकिन सुधीर एक बार यहीं से जीतकर अब भी बाहरी होने का प्रचार झेल रहे हैं। सात अन्य दल और निर्दलीय भी समीकरण प्रभावित कर रहे हैं। दूसरा गोरखा और तिब्बत वोटर भी इस सीट पर है। कपूर के गद्दी समुदाय से होने का असर भी दिख रहा है। इन तमाम समीकरणों के बीच यहां सुधीर और कपूर के बीच टक्कर कांटे की है।

शाहपुर - इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला दिख रहा है। भाजपा की सरवीण चौधरी, कांग्रेस के केवल पठानिया और कांग्रेस बागी मेजर विजय सिंह मनकोटिया के बीच टक्कर है। पीएम मोदी ने यहां रैली के साथ कांग्रेस के बीच बगावत का फायदा भाजपा उठाना चाहती है। कांग्रेस में यहां खींचतान का फायदा 2012 में भी सरवीण को मिला है। केवल वीरभद्र के बेहद करीबी हैं तो मनकोटिया घोर विरोधी। लगातार जीत रहीं सरवीण को लेकर एंटी इंकंबेंसी भी प्रचार के दौरान सामने आई है। भाजपा का यहां केवल से अधिक मनकोटिया के खिलाफ प्रचार अभियान है।

देहरा - चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, यहां मुकाबला रोचक और त्रिकोणीय होता जा रहा है। भाजपा के रविंद्र रवि के खिलाफ कांग्रेस ने राज्यसभा सांसद विप्लव ठाकुर को उतारा है। चुनाव शुरू होने तक मुकाबला दोनों प्रमुख दलों के बीच माना जा रहा था, लेकिन प्रचार आगे बढ़ा तो निर्दलीय ठाकुर होशियार सिंह सुर्खियों में आने लगे। होशियार ने यहां रवि और विप्लव को कांटे की टक्कर दी है। धूमल के सीएम घोषित होने का असर इस सीट में झलक रहा है। कांग्रेस और भाजपा के साथ निर्दलीय का त्रिकोण मतदान के दिन तक कितना टिकता है, इस पर नतीजे निर्भर करेंगे।

ज्वाली - ओबीसी बहुल इस सीट पर इस बार कांग्रेस ने विधायक नीरज का टिकट काटकर उनके पिता एवं पूर्व सांसद चंद्र कुमार को उतारा है। पार्टी उनके बडे़ कद पर भरोसा कर रही है तो भाजपा के अर्जुन सिंह ठाकुर उनकी टक्कर में हैं। अर्जुन पिछली बार लगभग 44 सौ वोट से हारे थे। इस बार पार्टी अलग रणनीति से इस सीट पर उतरी है। चंद्र के उतरने से भाजपा यहां कांग्रेस को बैकफुट पर दिखाने का दांव खेल रही है।

जसवां परागपुर - परिसीमन से पहले यह सीट जसवां थी, जिसमें परागपुर और ज्वालामुखी का एक हिस्सा शामिल हुआ है। भाजपा ने दो बार के विधायक विक्रम सिंह को उतारा है, जबकि कांग्रेस ने नए चेहरे सुरेंद्र मनकोटिया को उतारा। मनकोटिया हिमाचल प्रदेश कामगार कल्याण बोर्ड के वाइस चेयरमैन हैं। वीरभद्र के करीबी मनकोटिया के लिए राजौर का टिकट काटा गया। कांग्रेस यहां वीरभद्र के भरोसे है तो भाजपा मोदी - धूमल पर निर्भर है।

फतेहपुर - पीएम मोदी ने हिमाचल में अपने चुनाव अभियान की शुरुआत यहीं से की। भाजपा ने कृपाल परमार को मौका दिया, जिनको खासी बगावत झेलनी पड़ रही है। बलदेव ठाकुर कृपाल के खिलाफ निर्दलीय उतरे हैं। कृपाल की चुनौती बलदेव पर जाकर ही कम नहीं होती, बल्कि पुराने भाजपाई राजन सुशांत जिन्हें अब पार्टी अपना नहीं मानते वो भी मैदान में हैं। इस दोहरी चुनौती के बाद बाहरी होने का प्रचार झेल रहे कृपाल मोदी फैक्टर के भरोसे हैं। कांग्रेस के कैबिनेट मंत्री सुजान सिंह पठानिया मैदान में हैं।

नूरपुर - इस सीट पर भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। कांग्रेस से अजय महाजन तो भाजपा से राकेश पठानिया मैदान में हैं। सिटिंग विधायक अजय को 2012 में राकेश ने बतौर निर्दलीय टक्कर दी थी। इस बार स्थिति अलग है भाजपा राकेश को लेकर आई। बागियों को मना लिया गया। महाजन परिवार का खासा रसूख इस बार दांव है। वीरभद्र सिंह ने अजय के लिए प्रचार किया तो मोदी का वजीर राम सिंह पठानिया का कार्ड और धूमल के सीएम प्रत्याशी घोषित से यहां भाजपा उत्साहित है।

ज्वालामुखी - भाजपा का गढ़ माने जाने वाली इस सीट पर 2012 में कांग्रेस के संजय रत्न उलटफेर किया। संजय इस बार फिर भाजपा नेता रमेश धवाला के सामने हैं। इस बार संजय को भाजपा से अधिक कांग्रेस के बागियों से जूझना पड़ रहा है। निर्दलीय विजेंद्र धीमान को पार पाने के साथ रत्न को भाजपा से भी कड़ी टक्कर मिल रही है।

इंदौरा - रोचक नतीजों के लिए जानी जाने वाली सीट इंदौरा में इस बार कई समीकरण सामने आ रहे हैं। यहां सिटिंग विधायक मनोहर धीमान पहले भाजपा की शरण में गए, फिर कांग्रेस से टिकट लेने को उतरे। दोनों जगहों से निराशा के बाद उन्होंने चुनावी मैदान छोड़ दिया। भाजपा ने एक बार फिर रीता धीमान को उतारा तो कांग्रेस ने कमल किशोर पर भरोसा जताया। मनोहर बिना चुनाव में उतरे अहम रोल में आ गए हैं। उनका भाजपा को मिला समर्थन कितना असर दिखता है, यह नतीजों से तय होगा।

Spotlight

Most Read

rajpath

चौका लगाने के लिए बेताब सतपाल सत्ती के सामने रायजादा की चुनौती

हिमाचल में फिर सत्तासीन होने का दंभ भर रही भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सत्ती इस बार भी ऊना सदर हलके से चुनाव लड़ रहे हैं।

8 नवंबर 2017

Related Videos

‘कालाकांडी’ ने ऐसा किया ‘कांड’ की बर्बाद हो गई सैफ की जिंदगी!

‘कालाकांडी’ ने चार दिन में महज तीन करोड़ की कमाई की है। और तो और ये लगातार पांचवां साल है जब सैफ अली खान की मूवी फ्लॉप हुई यानी बीते पांच साल से सैफ एक अदद हिट मूवी के लिए तरस गए हैं।

17 जनवरी 2018

  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper